गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

कलयुग में अब तक रावण-दहन नहीं हुआ .........




लो दशहरा आया और चला भी गया। खूब पूजा-पाठ व्रत-उपवास किये गए, मौज-मस्ती भी खूब हुई और अंत में लंका दहन के नाम पर रावण के पुतले को जला कर पूरा समाज आत्म-संतुष्टि के भाव से भर गया। रावण-दहन केवल बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य, अनीति पर निति की विजय का प्रतीक नहीं बल्कि हमारे समाज के सकारात्मक सोच की पराकाष्ठा का भी ज्वलंत उदाहरण है। हर रोज़ नज़रों के सामने बुराई, असत्य, अनीति को जीतता हुआ देख कर भी हर साल सदियों पूर्व मिले एक जीत की ख़ुशी में हम जश्न मनाना नहीं भूलते इससे बेहतर सकारात्मक सोच का उदहारण क्या हो सकता है भला? 

 क्यूँ भूतकाल को पीछे छोड़ कर हम वर्तमान में नहीं आ पा रहे? आखिर कबतक हम पुतले को जला जला कर अपनी बहादुरी जताएंगे? क्यूँ नहीं समाज के असली रावणों को पहुंचा पा रहे हम उनके अंजाम तक? क्या इसलिए की हम सब बैठ कर फिर से उस राम के जन्म की प्रतीक्षा कर रहे हैं या फिर इसलिए की रावण की कमजोरी बता कर लंका दाहने वाले विभीषण अब जन्म नहीं ले रहे? 

राम के जन्म का तो पता नहीं लेकिन अगर विभीषण का इंतज़ार है तो वो अब कभी नहीं आने वाला क्यूंकि अब कोई भी रावण किसीको विभीषण बनने नहीं देता, उस रावण के पास कमसकम इतना आत्म-स्वाभिमान तो था कि अगर सीता से उसकी वासना पूर्ति होती तो वो उसकी साम्रागी होती पर आज का रावण 'साम्रागी' नहीं 'सामग्री' मानता है वो भी सार्वजनिक, जिसका भोग वो मिल बाँट कर कर सकता है तभी तो गैंग रेप की प्रथा सी चल पड़ी है और इसलिए अब कोई विभीषण भी रावण के खिलाफ खड़ा नहीं होता। इन विभीषण-प्रिय-रावणों से थोडा नज़र हटायें तो और भी ऐसे एक से एक दुराचार-विभूतियाँ मिलेंगी जिन्हें अगर मैं रावण की संज्ञा दूँ तो अपना अपमान समझ कर रावण भी मुझपर मानहानि का दावा ठोंक देगा। जी हाँ मैं वैसे ही पिताओं की बात कर रही हूँ जो अपनी ही मासूम बेटियों को नहीं बख्शते चाहे वो छः माह की हो तीन या फिर चौदह वर्ष की इन लोगों के लिए तो शायद अब तक कोई शब्द किसी भी भाषा में बना ही नहीं। 

जिस प्रकार त्रेता युग में रावण का वध करने के पूर्व उसके सारे सहायकों का वध करना पड़ा था ठीक उसी तरह समाज से रावणों का समूल नाश करने के लिए उन विकृत सोच वाले लोगों को भी उचित दण्ड मिलना ही चाहिए जो गाहे बगाहे मेघनाद सा गर्जन करते हुए न सिर्फ सारा दोष स्त्री जाती पर मढ़ देते हैं बल्कि रावण का वेष धरे कामी पुरुषों को संरक्षण के साथ-साथ ये तसल्ली भी दे देते हैं कि जब तक मैं हूँ तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जब तक रेप के कारणों को ढूंढने के नाम पर सारा दोष लड़कियों की पढाई, कभी उनके खुले विचार, कभी कपडे, कभी विवाह का उम्र, तो कभी बेबुनियादी तरीके से चाउमीन जैसी चीजों पर मढ़ने की छुट देते रहेंगे हम रावणों के पिछलग्गू मेघ्नादों को तबतक इनके पीछे छिप कर रावण अपनी कुकृत्यों को अंजाम देता रहेगा। हम सब बस परंपरा के नाम पर रावण का पुतला जलाएंगे और समाज में असली रावणों की संख्या बढती जायेगी, दहन होगा तो बस सीता और उसके परिजनों का। 












याद रखो ये त्रेता नहीं कलयुग है और कलयुग में अब तक रावण-दहन नहीं हुआ .........  














सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

माता ऐसा वर दे मुझको . . . . . . . . .




माता ऐसा वर दे मुझको,  सारे सदगुण मैं पा जाऊं 
छोड़ सकूँ दुर्गुणों को सारे, दुर्बलता को भी तज़ पाऊं 

अडिग रहूँ कर्तव्यपथ पर, लाख डिगाय न डिग पाऊं 
अचल-अटल हो सकूँ शैल सी, हे शैलपुत्री ऐसा वर दो  

रह सकूँ संयमित सदैव, संकल्प की दृढ़ता मैं पाऊं
उत्कृष्ट हो हर आचरण, हे ब्रह्मचारिणी ऐसा वर दो  

स्वीकृत न हो अन्याय, न्याय की पक्षधर बन पाऊं
जगत कल्याणमयी हर सोच हो, चंद्रघंटा ऐसा वर दो 

सूर्य किरणों सा तेज़ दो माता, अंधकारों से लड़ पाऊं 
त्याग-प्रेम की ऊष्मा हो मुझमें, कुष्मांडा ऐसा वर दो 

ममत्व नारी का सहज गुण, पराकाष्ठा उसकी बन पाऊं 
अपने-पराये का भेद न हो, हे स्कंदमाता ऐसा वर दो  

भटक जाऊं न राह कभी, गुरुर मातपिता का बन पाऊं 
दिल से निभा सकूँ हर रिश्ता, कात्यायनी ऐसा वर दो  

मानवता कल्याण कर सकूँ,पापियों का काल बन पाऊं
हो शक्ति पाप के नाश की मुझमें, कालरात्रि ऐसा वर दो

कर्तव्यविमुढ़ता ना आये कभी, परिस्थिनुरूप ढल पाऊं
कर्तव्यपरायणता सदा हो मुझमें, महागौरी ऐसा वर दो

छूटे न अधुरा संकल्प कोई, पूर्णता हर कार्य को दे पाऊं 
खरी उतरूँ आशाओं की कसौटी पे, सिधिदात्री ऐसा वर दो  

सार्थकता दे सकूँ नाम को अपने, आलोकिता मैं बन पाऊं
आलोकित करूँ अँधेरी राहों को, हे माता वो तेज़ प्रबल दे दो 

    
     

सोमवार, 10 सितंबर 2012

हकीकत से आँखें मूंद के जीना नासमझी नहीं





ना पूछ जिन्दगी में तेरी जरुरत क्या है 
जो तू नहीं तो फिर जिन्दगी की जरुरत क्या है 

हकीकत से आँखें मूंद के जीना नासमझी नहीं 
गर टूट भी जाए तो सपनो से खुबसूरत क्या है 

इश्क में डुबके जिसने खुद को भुलाया नहीं
क्या जाने वो की लज्ज़त-ए-मोहब्बत क्या है 

ख्वाब था इश्क, इबादत भी तू हो गया है 
कह दे जिन्दगी में तेरी मेरी अहमियत क्या है 

ना चाह के भी हर बार तुझे हीं लिख बैठती हूँ 
पूछ हीं देते हैं सब बेदर्द की शक्ल-ओ-सूरत क्या है  

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

बहन-रक्षा का प्रण लेने की जरुरत नहीं


अभी पिछले हीं दिन अखबार में छपी एक खबर में पढ़ा था बारहवीं की एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मुख्य नामजद अपराधी प्रशांत कुमार झा तीन बहनों का भाई है, उसकी बहन के बयान से शर्मिंदगी साफ़ झलक रही थी और छोटी बहन तो समझ भी नहीं पा रही उसके भाई ने किया क्या है | बस यही सोच रही थी की आज राखी के दिन क्या मनः  स्थिति होगी ऐसी बहन की जिसका भाई बलात्कार के जुर्म में जेल गया हो ...............

तेरे हिस्से की राखी आज जला दी मैंने 
इस बंधन से तुझको मुक्ति दिला दी मैंने 
अफ़सोस तेरी बहन होने के अभिशाप से छुट ना पाउंगी 
अपनी राखी की दुर्बलता पर जीवन भर पछ्ताउंगी 
मुझ पर उठी एक ऊँगली, एक फब्ती भी बर्दास्त ना थी 
सोचती हूँ कैसे उस लड़की का शील तुमने हरा होगा ?
वर्षों का मेरा स्नेह क्यूँ उस वक़्त तुम्हे रोक सका नहीं? 
क्यूँ एक बार भी उसकी तड़प में तुम्हे मेरा चेहरा दिखा नहीं?
इतनी दुर्बल थी मेरी राखी तुझको मर्यादा में बाँध ना सकी 
शर्मशार हूँ भाई, कभी तेरा असली चेहरा पहचान ना सकी
उधर घर पर माँ अपनी कोख  को कोस कोस कर हारी है
तेरे कारण हँसना भूल पिता हुए मौन व्रत धारी हैं 
सुन ! तेरी छुटकी का हुआ सबसे बुरा हाल है 
अनायास क्यूँ बदला सब, ये सोच सोच बेहाल है
छोटी है अभी 'बलात्कार' का अर्थ भी समझती नहीं 
हिम्मत नहीं मुझमे, उसे कुछ भी समझा सकती नहीं 
पर भाई मेरे, तु तो बड़ा बहादुर है, मर्द है तु 
उसको यहीं बुलवाती हूँ , तु खुद हीं उसको समझा दे 
बता दे उसे कैसे तुने अपनी मर्दानगी को प्रमाणित किया है 
और हाँ ये भी समझा देना प्यारी बहना को, वो भी एक लड़की है 
किसी की मर्दानगी साबित करने का वो भी जरिया बन सकती है 
अरे ये क्या, क्यूँ लज्जा से सर झुक गया, नसें क्यूँ फड़कने लगीं ?
यूँ दाँत पिसने , मुठ्ठियाँ  भींचने से क्या होगा ?
कब-कब, कहाँ-कहाँ, किस-किस से रक्षा कर पाओगे?
किसी भाई को बहन-रक्षा का प्रण लेने की जरुरत नहीं 
खुद की कुपथ से रक्षा कर ले बस इतना हीं काफी है 
जो मर्यादित होने का प्रण ले ले हर भाई खुद हीं 
किसी बहन को तब किसी रक्षक की जरुरत हीं क्या है?  

   

मंगलवार, 12 जून 2012

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है



















जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

शमा भी जलती चिता भी जलती 
जलती अगन दोनों में है 
औरों को रौशनी देने को शमा जलती,
कतरा-कतरा पिघलती है 
भष्म करके कई खुशियों अरमानो को हीं 
चिता कि लपटों को शान्ति मिलती है 
ज्योत शमा की चमक लाती नयनो में 
चिता की दाह अश्रुपूर्ण कर जाती है

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

उसी आग से जलता चूल्हा 
उसी से जलती भट्टी शराब की 
एक चूल्हे का जलना 
कई दिलों में ख़ुशी होठों पे हंसीं लाता है 
जलती जब एक शराब की भट्टी 
कितनो का घर लुट जाता है 
चूल्हे का जलना छुधा को तृप्ति पहुँचाता 
भट्टी स्वयं कितनी जिंदगियां, कितने रिश्तों को पी जाती है 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

जितनी पावन सात फेरों की अग्नि 
उतनी हीं पापिन दहेज़ की अग्नि 
जन्म-जन्मान्तर के रिश्ते में बांधती 
बनती सात वचनों की साक्षी फेरों की अग्नि 
रिश्ते हीं नहीं शर्मशार करती मानवता को भी 
बहुओं को जिन्दा जलाती दहेज़ की अग्नि 
इक गढ़ती नित नव रिश्ते
दूजी फूंकती प्रेम की डोरी 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

बीड़ी-सिगरेट के सिरे पर जलती छोटी लाल सी चिंगारी 
और जलती पूजा घर के धुप में भी 
दम घोंटता बीड़ी-सिगरेट का धुआँ 
मौत का दूत बन जाता है 
सुवासित करता धुप चहु दिशाओं को 
मानसिक सुकून भी पहुँचाता है 
इक कदम दर कदम मौत की तरफ ले जाता 
दूसरा आस्था का प्रतीक बन टिमटिमाता है 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

प्रेम की अग्नि जलती दिलों में 
विरहाग्नि दिलों को जलाती है 
मिलन भी उतपत करता जिस्मो-ओ-जिगर को 
विरह की ऊष्मा भी जलाती है 
हो इकतरफा भी लगी अगन तो
ताप दूजे तक भी जाती है 
जलना ये भी कहलाता है 
जलना वो भी तो होता है 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है

.....................................................आलोकिता गुप्ता      

गुरुवार, 3 मई 2012

क्या यही प्रेम परिभाषा है ?


तुझसे लिपट  के........... तुझी में सिमट जाऊं 
भुला  के खुद को.......... तुझपे हीं मिट जाऊं 
ये कैसी तेरी चाहत ? ये कैसा है प्यार सखे ?
मिट जाए पहचान भी नहीं मुझे स्वीकार सखे 

है प्यार मुझे भी, प्रीत की हर रीत निभाउँगी
तुझसे जुडा हर रिश्ता सहर्ष हीं अपनाउंगी
पर  भुला दूँ अपने रिश्तों को मुझसे ना होगा 
एक तेरे लिए बिसरा दूँ सब मुझसे ना होगा 

बेड़ियों सा जकड़ता जा रहा हर पल मुझको 
ये कैसा प्यार जो तोड़ रहा पल पल मुझको ?
खो दूँ अपना अस्तित्व ये कैसी प्रीत कि आशा है ?
पाके तुझको खुद को खो दूँ यही प्रेम परिभाषा है ?

                                                    .......................आलोकिता 

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

आखिर कब तक ?

हमारे देश में हमेशा से असमानता को हटाये जाने का प्रयास होता रहा है लेकिन यह 'असमानता' जाने कबतक हमारे देश के अस्तित्व से चिपकी रहेगी ? कब तक भेद भाव का सामना करना पड़ेगा समाज के विभिन्न वर्गों को ? कभी जातियता , कहीं लिंग तो कभी अमीरी और गरीबी का भेद भाव, खैर इन विषयों पर तो अक्सर विचार विमर्श होते हीं रहते हैं पर अक्षमता और सक्षमता के आधार पर भी भेद भाव होते रहते हैं लेकिन इस विषय पर चर्चाएँ भी काफी कम होती हैं |


 अभी हाल हीं का एक उदाहरण ले लीजिये जब जीजा घोष को हवाई जहाज में चढ़ के बैठ जाने के बाद सिर्फ इसलिए उतार दिया गया क्यूंकि वो एक अक्षम महिला हैं और उस जहाज का चालक उत्प्रभ तिवारी चाहता था कि उन्हें उतार दिया जाए | ये तो वही रंग भेद वाली जैसी बात हो गयी ना, या कहें उससे भी बढ़ कर, क्यूंकि गांधी जी को जब गोरों के डब्बे से उतारा गया था उस वक़्त अश्वेत लोगों के लिए अलग डब्बे होते थे रेल गाडी में, और इस बात की खबर भी होती थी उन्हें, कि उनके लिए अलग डब्बे निर्धारित किये गए हैं यहाँ तो वो भी नहीं है | यह दुर्व्यवहार की घटना महज जीजा घोष के साथ हीं नहीं हुई अपितु आये दिन अक्षम व्यक्तियों को ऐसे भेद भावों का सामना करना पड़ता है | 


महिला सशक्तिकरण, समाज में महिलाओं की हिस्सेदारी और भागीदारी की बात तो आज कल चर्चा-ए-आम है और उन्ही चर्चाओं में अक्सर कुछ वाक्यांशों का प्रयोग किया जाता है जैसे 'औरत कोई वस्तु नहीं' या 'औरत सिर्फ एक शरीर नहीं' ये बातें महज औरत नहीं बल्की हर इंसान पर लागू होती हैं | किसी भी इंसान के लिए वस्तु या बेजान शरीर मान कर किया गया व्यवहार उतना हीं कष्टकारी होता हैं | बेशक इंसान का मतलब केवल सक्षम व्यक्ति नहीं होता | विकलांगता प्रमाण पत्र धारी व्यक्ति भी कोई वस्तु नहीं जिसे किसी की भी मर्ज़ी से कहीं से भी हटा दिया जाए | विकलांग व्यक्ति मात्र एक विकृत शरीर नहीं वो भी एक इंसान है जिसमे सोचने की समझने की सुख दुःख महसूस करने की क्षमता है | जीवन के कदम कदम पर जब किसी विकलांग व्यक्ति को ऐसे भेद भावों का सामना करना पड़ता है तो एक आम इंसान की तरह उसका भी दिल दुखता है उसकी भी भावनाएं जख्मी होती हैं क्यूंकि उसके भी दिल में आम इंसान के जैसे हीं जज्बात होते हैं | 


जीजा घोष जैसी घटनाएं ना सिर्फ उस पीड़ित व्यक्ति के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती हैं बल्की हज़ारों अक्षम लोगों के आत्मबल को तोड़ देती हैं | अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद खुद को सामाजिक  मानदंडो पर सक्षम साबित कर देने के बावजूद भी जब किसी को आत्मसम्मान के साथ जीने का हक नहीं मिलता तो इसे मानवीय अधिकारों का हनन नहीं तो और क्या कहेंगे? ऐसी घटनाएं मात्र मानवीय नहीं अपितु कानूनी अधिकारों का भी हनन है | जीजा घोष इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ सेरेब्रल पाल्सी  की विकलांगता अध्ययन की अध्यक्षा हैं और उनके साथ हुआ यह दुर्व्यवहार साफ़ तौर पर हमारे समाज की पिछड़ी हुई मानसिकता को दर्शाता है | जब हमारे देश के इतने पढ़े लिखे और तथाकथित समझदार लोगों के बीच ऐसी घटनाएं होती हैं तो एक बार ध्यान अपनी शिक्षा प्रणाली पर जरुर जाता है क्यूंकि कहते हैं 'विद्या ददाति विनयम' , उत्प्रभ तिवारी जैसे लोगों को कैसी विद्या दी गयी है जिसमे विनय है हीं नहीं ? ऐसी शिक्षा का क्या फायेदा जो एक मानव के भीतर मानवीयता को हीं ना जगा पाए? 


ऐसी परिस्थितियों में कई सवाल मन में दस्तक देते हैं | आखिर कब तक शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को अपना स्वाभिमान खोकर जीना पड़ेगा?कब आएगी वो संवेदनशीलता हमारे समाज में जब इंसान को इंसान के रूप में देखा जाएगा? कब आएगा वो दिन जब हर किसीको उसका अधिकार मिल पायेगा ? आखिर कब?  
       

बुधवार, 21 मार्च 2012

बिहार अपनी नज़रों से . . . . .

 छलछलाई हुई आँखों के साथ जब आज अपने मन की बातें आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ तो मुझे शब्द हीं नहीं मिल रहे उनको व्यक्त करने के लिए . . . । कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ विराम दूँ अपने शब्दों को ? कैसे समेट लूँ अपने सारे जज्बातों को चंद शब्दों में ? अपने सौवें वर्षगाँठ पर अपने बच्चों का उत्साह देखकर जो हर्ष की अनुभूति  हो रही है उस को व्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल है । अपने सौ वर्ष की जिन्दगी में बहुत से उत्थान पतन देखे हैं मैंने , कई अनुभवों से गुज़रा हूँ । एक बात दिल में कई दिनों से दफ्न है जो आज व्यक्त कर देना चाहता हूँ । भले हीं मेरे नाम के साथ 'पिछड़ा और गरीब राज्य' का तमगा हो लेकिन गर्व है मुझे इस बात का की अभावों में जीने के बावजूद भी मेरे बच्चे किसी से कम नहीं और इस बात को सिद्ध करके उन्होंने हमेशा मुझे गौरवान्वित किया है । हर्ष होता है ये कहते हुए की पूरे देश को अगर कोई राज्य सबसे अधिक आई.ए.एस और आई.पी.एस देता है तो वो हूँ मैं "बिहार"। मेरे इन सपूतों से तो सभी वाकिफ हैं पर इनके अलावा और भी मेरी गोदी के लाल हैं जो खुद अंधेरों में होने के बावजूद औरों की जिंदगियों को आलोकित करते हैं । कई ऐसे हैं जिनके हाथ स्वयं खाली हैं पर फिर भी उनका रोम रोम समाज को समर्पित है । हर किसी से मिलवा पाना संभव नहीं पर आइये मिलवाता हूँ आपको मेरी अनंत गहराइयों के कुछ अनमोल मोतियों से . . . . .

आज पुरे विश्व में एक दुसरे से आगे बढ़ने के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा मची हुई है , लेकिन ऐसे भी लाल हैं मेरी माटी के जो खुद आगे बढ़ तो सकते हैं पर मानवता उनके स्वार्थ पर हावी होती है और वो पीछे मुड़ कर दूसरों को आगे बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं । उदाहरण के तौर पर बनियापुर, सारण का छबीस वर्षीय शशांक और चकदरिया, वैशाली का सत्ताईस वर्षीय मनीष दोनों मित्र आई.आई.टी (क्रमशः दिल्ली और खड़गपुर )से पास होने के बाद मोटे वेतन को ठुकराकर लौट आये गाँव की राह पर और फ़ार्म एंड फार्म्स नाम से संस्था खोली जो न  सिर्फ गरीब किसानो को वैज्ञानिक खेती के गुर बताती हैं बल्कि उनकी उपज को बाज़ार भी मुहैया कराती हैं । सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, बांका, पूर्णिया और रोहतास जिला के सत्तर गावों के किसानो का एक सशक्त नेटवर्क तैयार किया है उन्होंने और आज उनके पास आई.आई.टी और एन.आई.टी के छात्र इंटर्नशिप के लिए आते हैं । ऐसा हीं एक उदाहरण है दरभंगा का चालीस वर्षीय यतीन के सुमन जो विदेश में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने के बाद लन्दन की नब्बे हज़ार पौंड और फाइव स्टार होटल में रहने का प्रस्ताव ठुकरा कर अपने प्रदेश के विकास और समृधि के लिए लौट आया और पूरी कर्मठता से इस काम में जुटा है । ऐसे हीं एक डॉक्टर दंपत्ति प्रभात दास एवं सौम्या दास हैं जिन्होंने विदेश में रह कर पढ़ाई की लेकिन फिर भी बड़े शहरों और देशों के सुख सुविधाओं को त्याग कर दरभंगा जैसी छोटी जगह पर आकर न सिर्फ लोगों को स्वास्थ सुविधाएं उपलब्ध करायी बल्कि अपनी कमाई का दो बटे सात हिस्से को सामजिक कार्यों में लगाते हैं ।आरा के साठ वर्षीय डॉक्टर एस के केडिया गरीब जन्मांध बच्चों का न सिर्फ खुद मुफ्त इलाज करते हैं बल्कि विदेश से अपने खर्चे पर विशेषज्ञ डॉक्टर को बुलाकर भी बच्चों की मदद करते हैं ।  
  
इन सब के पास तो कुछ था समाज को देने के लिए लेकिन ऐसे भी अनगिनत नामों की सूचि है जिनकी झोली खाली है फिर भी इतना कुछ दिया और दे रहे हैं समाज को जिन्हें शायद उनका समाज कभी भी लौटा न पाए । भागलपुर के पचपन वर्षीय वशिष्ठ मल्लाह जिनका काम मछली पकड़ना है और एक मात्र कला जो उन्हें आती है वो है तैराकी और उसी के दम पर कई घरों के मसीहा बन चुके हैं । सुबह चार बजे से देर रात तक गंगा में डूबने वालों की जिन्दगी बचाते हैं और जरुरत पड़ने पर उन्हें अस्पताल तक अपने खर्चे से पहुंचाते हैं ।रिंग बाँध, सीतामढ़ी के सडसठ वर्षीय बद्रीनारायण कुंवर कुष्ठ रोग की वजह से इनकी आँखे चली गयी, गाँव से निष्कासित कर दिए गए, दोनों बच्चे असमय चल बसे लेकिन इन्होने कुष्ठ कॉलोनी के हर बच्चे को अपना मान कर वहाँ ज्ञान की ज्योति जलाई । डुमरा, समस्तीपुर के पैंतालिस वर्षीय राजकिशोर गोसाईं जिनके पास मात्र दस डिसमिल जमीन थी जिसे उन्होंने गाँव के बच्चो की खातिर स्कुल बनवाने के लिए दान कर दिया । दोनों पैरों से विकलांग राजकिशोर जी डोरी-धागा बेच कर बड़ी मुस्किल से अपना जीवन यापन करते हैं पर उन्हें  अपनी ज़मीन का कोई अफ़सोस नहीं । जमालपुर, मुंगेर के पैंतालिस वर्षीय रेलवे तकनीशियन सहदेव पासवान ने हजारों बच्चे जिनकी पढाई अधूरी छुट गयी उनको मुफ्त पुस्तकालय दे कर आगे बढ़ने का राह दिखाया और इस पुस्तकालय की वजह से साढ़े तीन सौ से अधिक बच्चे सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के अच्छे पदों पर आसीन हैं । समस्तीपुर के बयासी वर्षीय राम गक्खर पच्चीस वर्षों से लगातार हर रोज़ गरीब बच्चों को खिला रहे हैं ताकि वो भीख मांगने को विवश न हो, पापी पेट के लिए चोरी करना न सीखें । अगरवा मोतिहारी की पैंतीस वर्षीय सुगंधी देवी के जीविकोपार्जन का एक मात्र साधन है सदर अस्पताल के पास की उसकी छोटी सी चाय दूकान लेकिन खुद आर्थिक तंगी के बावजूद वो अस्पताल के बेसहारा मरीजों को हर संभव मदद देती हैं भले उसके लिए उन्हें उधार लेकर खुद क्यूँ न चुकाना पड़े । पुपरी, सीतामढ़ी के क्रमशः सैंतीस और चौंतीस वार्स के दिलीप कुमार तेम्हुआवला और अरुण कुमार तेम्हुआवला ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है कालाजार पीड़ितों के लिए । डुमरी गया के चौंतीस वर्षीय सच्चिदानंद सिंह उर्फ़ नंदा जी ने नक्सल बस्ती में मुफ्त स्कुल खोल कर हथियारों वाले हाथों में शिक्षा की मशाल थमा दी, महिलाओं के लिए ट्रेनिंग कैम्प चलाते हैं और जल्द हीं पटना के यारपुर डोमखाना में भी स्कुल खोलने वाले हैं । मो. निशांत, मो.शमशाद और मो. सुहैल जैसे भी लोग हैं जो बिना किसी अपेक्षा के मृत व्यक्तियों का साथ निभाते हैं , जी हाँ मृत व्यक्तियों का ऐसे मृत लोग जिनका दुनिया में कोई नहीं हर उस लावारिश लाश का अंतिम संस्कार  करते हैं ये लोग अपने खर्चे पर । मुसलमानों को सुपुर्द-ए-ख़ाक और हिन्दुओं का उनकी रीती रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाता है जिसमें इनकी मदद इनके कुछ हिन्दू मित्र करते हैं । बीवी मुहम्मदी जो खुद तो खड़ी भी नहीं हो सकती, ज़मीन पर घिसटती हुई गुज़ार रही है अपनी जिन्दगी पर अपनी अपंगता और गरीबी की वजह से जब वह स्कुल नहीं जा पायी उसी दिन उसने सोच लिया था की ऐसा किसी और के साथ नहीं होने देगी । अपनी मेहनत और लगन से घर पर हीं पढ़ कर आज सैंकड़ो गरीब बच्चों को शिक्षा प्रदान कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सिखा रही है । उसके जज्बे को सम्मानित करने के लिए मुख्यमंत्री खुद स्टेज से उतर कर उसके पास आये  और लाखों लोग एक अक्षम कि सक्षमता के साक्षी बने । मधुबनी की बेटी तथा कटिहार की बहु अडतालीस वर्षीय शैलजा मिश्रा ने हुस्न के बाज़ार की उन बदनाम गलियों से जहाँ रात के अंधेरों में तो जाने से कुछ मर्दों को कोई गुरेज़ नहीं पर दिन के उजाले में हवा भी जहाँ से कतरा के गुजरती है, उस रेड लाईट एरिया से पैसठ महिलाओं को निकाल कर सम्मान से जीना सिखाया । आज वो महिलायें इज्जत से कमा भी रही हैं और अपनी बेटियों को शिक्षित करके एक सभ्य समाज का हिस्सा भी बना रही हैं । इससे पहले शैलजा ने कदवा प्रखंड के महली टोला के गरीब आदिवासियों के जीवन में उजाला फैलाया, ईंट भट्ठों पर काम करने वाले बच्चों को स्कुल से जोड़ा महिलाओं को बांस के उत्पादों से आत्मनिर्भर बनाया । बरारी प्रखंड के सुजापुर स्थित टेराकोटा गाँव को आत्मनिर्भर बनाया और कुम्हारों को उनके पुस्तैनी काम पर वापस ला कर अपनी संस्कृति को भी सम्मान दिया है ।

अभी तो बहुत लम्बी सूचि बाकी है मेरी मिट्टी के सपूतों की । ऐसे ऐसे लाल हों जिस गोदी में कोई उस गोदी को कंगाल कैसे कह सकता है ? अक्सर लोगों से सुना है और कहना चाहूँगा की गलत सोचते हैं वो लोग जो कहते हैं बिहार के पास सिर्फ उसका इतिहास है । आज गर्व से कह सकता हूँ मैं कि बिहार के पास सुनहरा इतिहास , सशक्त वर्तमान और उज्जवल भविष्य है ।

सोमवार, 19 मार्च 2012

प्रेम की निशानी,एक जादुई शहर..............

  
चलो दोस्तों आज आपको एक कहानी सुनाती हूँ | ये कहानी ना किसी राजा की है ना रानी की, नाहीं किसी जादुई दुनिया की बल्की ये कहानी है एक ऐसे शहर की जिसने अपनी गलिओं में ऐसी हजारों हज़ार कहानिओं को संगृहीत कर रखा है | ये कहानी है उस शहर की  जिसने कई प्राकृतिक, अप्राकृतिक आपदाओं को झेला पर आज भी हँसता हुआ खड़ा है कर्तव्य पथ पर अडिग एक सैनिक की भांति | भारत के गौरवशाली इतिहास में अति प्राचीन शहरों में गिना जाता है इस शहर को | पुरातात्विक विशेषज्ञों की माने तो आज से लगभग ढाई हज़ार वर्ष पूर्व जन्मा था यह शहर जिसे आज हम 'पटना' के नाम से जानते हैं | जी हाँ बिहार कि राजधानी 'पटना' हीं है वो शहर जिसका प्रमाणित इतिहास  शुरू होता है चार सौ नब्बे ईसा पूर्व यानि हर्यक वंश के शासक राजा अजातशत्रु के शासन काल से, जब उन्होंने रणनीतिक दृष्टिकोण से राजगृह (वर्तमान में राजगीर) से बदलकर अपनी राजधानी बनाया इस शहर को, लेकिन  इस शहर का वास्विक इतिहास तो और भी पुराना और रोचक है | 
दन्त कथाओं में पटना को जादू से उत्पन्न एक शहर के रूप में दर्शाया गया है जिसके जनक राजा पत्रक ने इसका निर्माण किया अपनी प्यारी रानी पाटली के लिए और इसी कारण इसे पाटलिपुत्र या पाटलिग्राम के नाम से जाना जाता था | इतिहास के पन्नो पर कई जगह इसका उल्लेख पुष्पपुर या कुसुमपुर के रूप में भी मिलता है क्यूंकि यहाँ दवा और इत्र के लिए गुलाब की खेती बहुतायत मात्रा में हुआ करती थी | सत्रह सौ चार ई० में मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने अपने प्रिय पौत्र मुहम्मद अज़ीम जो कि उस वक़्त पटना का सूबेदार हुआ करता था के अनुरोध पर इसका नाम अजीमाबाद रखा |
इसके विभिन्न नामों से परिचित हो जाने के बाद आइये अब चलते हैं इतिहास कि गलिओं में और भी नज़दीक से जानने इस प्रेम की निशानी जादुई शहर को जो बसा है गंगा के किनारे सोन आर पुनपुन नदिओं के संगम पर | कहते हैं बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध ने अपने आखिरी समय में यहाँ से गुज़रते हुए कहा था कि इस शहर का भविष्य उज्जवल तो है पर कभी बाढ़, आग या आपसी संघर्ष की वजह से यह बर्बाद भी हो जायेगा | मौर्य साम्राज्य के उत्कर्ष के बाद से ही पाटलिपुत्र लगातार सत्ता का केंद्र बना रहा | मौर्य के बाद कई राजवंशों के राजाओ ने यहीं से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया | गुप्तवंश के शासनकाल को प्राचीन भारत का स्वर्णयुग कहा जाता है पर इसके बाद पाटलिपुत्र को वह गौरव प्राप्त नहीं हुआ जो मौर्य काल में प्राप्त था |गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद बख्तियार खिलजी ने यहाँ अपना आधिपत्य जमा लिया और कई आध्यात्मिक प्रतिष्ठानों को ध्वस्त कर दिया फलस्वरूप पटना अपने देश का राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र ना रहा लेकिन फिर भी मुग़ल काल के सत्ताधारियों ने इस पर अपना नियंत्रण बनाये रखा | शेरसाह सूरी ने जीर्ण पड़े शहर का पुनर्निर्माण करने कि सोची, गंगा तीर उन्होंने किला बनवाया | उनका बनवाया एक भी दुर्ग तो अब नहीं है पर अफगान शैली में निर्मित एक मस्जिद अब भी है | अफगान सरगना दाउद से युद्ध के  दौरान मुग़ल बादशाह अकबर भी यहाँ आयें थे |
पाटलिपुत्र का प्रथम लिखित विवरण यूनानी इतिहासकार मेगास्थनीज़ ने दिया | कहते हैं शुरुआती दौर में पाटलिपुत्र पुर्णतः लकड़ियों का बना हुआ शहर था फिर सम्राट अशोक ने बाद में इसे शिलाओं कि संरचना में तब्दील किया | इन संरचनाओं का जिवंत विवरण चीन के फाहियान द्वारा लिखे भारत के उनके यात्रा वृतांत में मिलता है | कौटिल्य ने अर्थशास्त्र और विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र कि रचना यहीं पर कि थी | अकबर के राज्य सचिव तथा आइन-ए-अकबरी के लेखक अबुल फज़ल ने पटना को कागज़, पत्थर तथा शीशे का संपन्न औद्योगिक केंद्र के रूप में वर्णित किया है | इन्ही विवरणों में यूरोप में प्रचलित पटना राईस नाम से चावल कि कुछ नस्लों कि  गुणवत्ता का भी वर्णन मिलता है | अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान यहाँ रेशम तथा कैलिको के व्यापर के लिए फैक्ट्री खोली गई और जल्द हीं यह सौल्ट पीटर(पोटैसियम नाइट्रेट) के व्यापर का एक अहम् केंद्र बन गया | ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन जाने के बाद यह व्यापर का महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा | उन्नीस सौ बारह में बंगाल विभाजन के बाद यह बिहार तथा उड़ीसा कि राजधानी बना | फिर उन्नीस सौ पैंतीस में जब उड़ीसा को भी विभाजित कर एक अलग राज्य बनाया गया तब भी पटना बिहार कि राजधानी बना रहा और आखिरकार दो हज़ार में जब बिहार पुनः बिहार और झारखण्ड दो राज्यों में बटा तब भी पटना ने अबतक राजधानी के रूप में अपना स्थान बरक़रार रखा है | 
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी नगर ने अहम् भूमिका निभाई है | नील कि खेती के विरोध में चंपारण आन्दोलन और उन्नीस सौ बयालीस का भारत छोडो आन्दोलन उलेखनीय है | इसी उन्नीस सौ बयालीस के भारत छोडो आन्दोलन के दौरान विधान सभा भवन के ऊपर तिरंगा फहराने की कोशिश में सात बहादुर स्कूली बच्चे भी शहीद हुए जिनकी स्मृति में पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालिस को शहीद स्मारक कि नीव रखी गई और आज भी आदम कद कि ये मूर्ति इतिहास कि गवाह के रूप में विधान सभा के मुख्य द्वार पर खड़ी है |
इस शहर के वास्तु को ऐतिहासिक क्रम में तीन खंडो में बांटा जा सकता है :- मध्य पूर्व भाग अर्थात कुम्हरार के आसपास मौर्य तथा गुप्त सम्राटों का महल, पूर्वी भाग अर्थात पटना सिटी के आसपास शेरशाह तथा मुगलों के काल का नगर क्षेत्र तथा बांकीपुर और उसके पश्चिम में बतानी हुकूमत के दौरान बसाई गई नई राजधानी |
भारतीय पर्यटन मानचित्र पर भी पटना का प्रमुख स्थान है, आधुनिक के साथ साथ कई ऐतिहासिक दर्शनीय पर्यटन स्थल भी हैं यहाँ जो कि इतिहास कि कई घटनाओं के साक्षी हैं | अभी और भी बहुत कुछ है कई हज़ार कहानिओं के ताने बाने से जुडा है यह शहर जिन्हें एक बार में बता पाना बहुत मुश्किल है | सिर्फ पटना नहीं पुरे बिहार को नज़दीक से जानने के लिए पढ़ते रहिये लेखों की एक ख़ास श्रृखला जो बिहार शताब्दी वर्ष के ख़ास मौके पर समर्पित है मेरे बिहार को ........................
जय हिंद ! जय बिहार !! 
शहीद स्मारक 


शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

अमर हो गए तुम




गुज़रे तुझे इन गलियों से 
यूँ तो इक ज़माना गुज़र गया 
पर यकीं है इतना 
गर आये तो 
आज भी इन्हें पहचान लोगे 
चका चौंध तो कुछ बढ़ी है 
नज़रें तुम्हारी पर इनपे टिकती कहाँ थी ?
इन गलियों की वो अथाह वेदना 
जो नम कर जाती थीं तुम्हारी आँखें 
वो दर्द जो झकझोर देते थे तुम्हे 
कहीं अन्दर तक 
वे सब तो आज भी वही हैं 
पंच बनके परमेश्वर भले हीं 
कोई अब बनता ना हो 
शराबखाने की भट्टी में 
कई बुधियाओं के कफ़न 
आज भी जलते हैं 
वो दरिद्र कृषक, वो अन्नदाता हमारे 
जिनकी व्यथा तुम्हारी कलम रोया करती थी 
आज भी व्यथित हो आत्मदाह करते हैं 
होरी की मेहनत आज भी 
पकते हीं खेतो में लुट जाती है 
पूस की रातों में आज भी 
हल्कू ठिठुरता है 
वो होरी, वो हल्कू, वो धनिया, वो मुन्नी 
सारे सजीव पात्र बिलखते हैं 
आज भी इस रंगभूमि पर 
सफेदपोश रातों के सहजादे 
घूमते हैं बेदाग 
और आज भी 
दालमंडी में बैठी सुमन 
अकेली हीं बदनाम हो जाती है
तथाकथित तुम्हारे वंशजों ने 
लिफाफे तो बदल दिए 
पर मजमून आज भी वही है 
ओ  कलम के सिपाही, प्रथम प्रेरणा मेरी 
और क्या क्या कहूँ तुमसे 
बस समझ लो 
अमर हो गए तुम और तुम्हारी कृतियाँ 
समाज कि इन विकृतियों के साथ 
सदा याद किये जाओगे किताबी पाठों में 
शायद सदा यही लिखते रहेंगे हम 
"वर्षों पूर्व लिखी ये कथाएं 
आज भी समाज का दर्पण सी लगती हैं 
सचमुच प्रेमचंद हीं कथा सम्राट है"


बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

प्रथम वेलेंटाइन डे


गलतियाँ तो हर इंसान से होती हैं | कभी वक़्त गलत होता है तो कभी हालात, कभी इंसान गलत होता है तो कभी उसके जज्बात | पर बंधुओं जिन्दगी में कभी कभी ऐसा भी होता है भले हमसे कुछ गलत हो जाए पर वक़्त और हालात इतने सही होते हैं कि हर गलती सही हो जाती है, और ऐसा जब जब होता है तो कसम है ऊपर वाले की, बड़ा मज़ा आता है | अब देखिये आज सुबह सुबह अगर सही वक़्त पर मुझसे गलती नहीं हुई होती तो इतनी मज़ेदार बात मुझे पता ना चलती और आप इसे पढ़ ना रहे होते | 
दरअसल हुआ ये कि आज सुबह सुबह हर रोज़ की तरह एक शिष्ट आधुनिक छात्रा बन के मैंने बुक खोला........... वही हम सबका सार्वजनिक बुक 'फेसबुक' | जैसे हीं पहला पन्ना खोला हरे सिग्नल के साथ मेरी एक महिला मित्र नज़र आयीं, अभी कुछ महीने पहले हीं परिणय सूत्र में बंधी हैं  तो सोचा चलो आज की पढाई इनकी हीं जिन्दगी से शुरू कि जाए | मैंने फटाफट लिख दिया "क्या हाल चाल है?" जैसे हीं इंटर दबाया ऐसा हीं एक प्रश्न मेरे सामने भी उछल कर आया और प्रश्नकर्ता थे मेरे एक मित्र जिनकी उम्र(53) कि वजह से मैं कहती हूँ उनको चचा जी | अदब से मैंने सलाम ठोका और लिख दिया मज़े में हूँ | इधर मेरे प्रश्न का भी काफी लम्बा चौड़ा उत्तर आ चुका था, उसे पढ़ कर नज़रें किबोर्ड पर गड़ाई और फटाफट अपने असली मकसद पर आई "तो फर्स्ट वेलेंटाइन डे, गिफ्ट शिफ्ट कि बारिश हुई होगी ? क्या क्या मिला?? कुछ अनुभव हमारे साथ भी शेयर कर लो" इतना टाईप करके खटाक से इंटर दबाया और जवाब के लिए कम्प्यूटर स्क्रीन को देखा तो मेरे तो होश हीं उड़ गए, मुँह से निकला "हाय राम शब्द किसको कहने थे मुझको किसको समर्पित हो गए" | खुद को हीं गाली देने का मन हो रहा था, क्या सोचेंगे अब चचा जी? अच्छा अच्छा शरीफ बच्चा वाला इम्प्रेसन गया खटाई में, पूरी इज्जत का फालूदा बन गया | सोचा सौरी लिख के स्थिति समझाउं पर तबतक उधर से जवाब लिखा जा चुका था "ह्म्म्म पहली बार कोशिश तो थी वेलेंटाइन डे मनाने की पर  गिफ्ट ? जूतों की बारिश हुई थी" | जवाब पढ़ के मैं तो बिल्कुल हिल गयी चार सौ चालीस वाट का झटका लगा | जूतों की बारिश? इससे अधिक कुछ लिख ना सकी आगे उन्होंने ही सारा माजरा बताया | उन्होंने क्या क्या बताया अब मैं क्या बोलूँ चलिए पढ़ लीजिये उनकी कहानी उन्ही कि जुबानी उनके अपने शब्दों में ........... 
""मैंने ना कभी ऐसा सोचा था ना इस बार सोचता पर क्या कहें हमारी औरकुट फेसबुक की दुनिया में दोस्ती के लिए उम्र का कोई प्रतिबन्ध तो है नहीं, मैंने भी बहुत से कम उम्र के लोगों से भी दोस्ती कर रखी है उन्ही में है एक, तृषा कुछ तेईस चौबीस साल की होगी | अक्सर बात होती है उससे, अभी दस दिन से पीछे पड़ी थी वेलेंटाइन डे का क्या प्रोग्राम है ? मैंने कहा था कि ये हमारे उम्र के लोगों के लिए नहीं है तो कहने लगी प्यार के इज़हार में उम्र कहाँ से आ गया प्यार तो अज़र अमर है वगैरह वगैरह | मैं भी उसकी बातों में आ गया, सोचा सही हीं तो कह रही हैं | पेपर में, फेसबुक में जहाँ जहाँ मिला हर जगह से टिप्स पढ़ पढ़ के पूरी तैयारी कर ली ये भी ठान लिया कि कुछ भी हो जाए चौदह को झगडा बिल्कुल भी नहीं करूँगा | सबसे पहले तो रात को बारह बजे श्रीमती जी को जगाने की कोशिश की तो जोरदार झाड पड़ी "आपकी तरह आराम से आठ बजे तक सोते नहीं रहना है, मुझे भोर से हीं उठ के झाड़ू पोछा करना है रसोई का काम अलग से, ज़रा सी नींद लगी नहीं कि पता नहीं क्यूँ जगाने लगे " मैं चुपचाप सो गया सुबह उठा तो उसका मूड अच्छा था काफी खुद हीं शर्माती हुई सी आई और मुझे एक ख़ूबसूरत से पैक किया हुआ गिफ्ट देती हुई बोली " ए जी है...हैप्पी.......अम्मम्म......... आज जो है ना वही वाला डे जी, आप समझ गए ना मुझे बोलने में शर्म आ रही है" और हंसती हुई आँचल में मुँह छिपा लिया | उसे देख कर मुझे भी थोडा जोश आ गया मैंने बोला हाँ उसी लिए मैंने भी एक गिफ्ट ख़रीदा है और उसे मैंने वो नया जूता दिखाया जो मैंने ख़रीदा था, देखते हीं बिफर पड़ी अभी दो सेकेण्ड पहले नाज़ुक सी कली लग रही थी अचानक से अंगारा बन गयी | अब बताओ इसमें मेरी क्या गलती है अखबार में लिखा था 'अगर आप समझ नहीं पा रहे कि अपने साथी को क्या तोहफा दें, तो ध्यान दीजिये कि  उन्हें किस चीज़ की चाहत है, हो सकता है उन्होंने आपसे कुछ माँगा हो और आपने व्यस्तता की वजह से नज़र अंदाज़ कर दिया हो' मैंने भी सोचा तो पाया कई दिनों से वो रट रही थी "आपके जूते पुराने हो गए हैं नए ले लो लेलो" मैंने वही ले लिया तो अब उसके लिए गुस्सा हो गयी | इसके बाद वो हड़ताल पर चली गयी पर उसका हड़ताल हिन्दुस्तानी नहीं जापानी स्टाइल में होता है ज्यादा काम करने लगती है, नास्ते में रोटी पर रोटी डालती चली गयी और ऐसे मौके पर थाली में कुछ छोड़ना भी गुनाह है सात रोटियाँ खाने के बाद मुश्किल से उठ पाया | ऑफिस जाते वक़्त मैंने अपने  जूते  भी लौटा दिए दुकानदार से बहस हो गयी अलग | शाम को लौटते वक़्त बेटे का फोन आया मतलब साफ़ था सब जगह फोन करके खबर पहुँच चुकी थी कि मैं कितना ज़ालिम हूँ, बेदर्द हूँ सब कुछ हूँ | बेटे ने समझाया घर जा के मम्मी को मना लीजिये कहीं बाहर ले के जाइए | उसने फोन रखा तो बेटी का फोन आ गया क्या "पापा आप भी ना गज़ब हैं एक तो मम्मी के लिए कुछ लाये नहीं और उनका गिफ्ट खोल के देखा तक नहीं ? गलत बात है ना ?" सब के निर्देश सुनने के बाद घर जाने के रास्ते में सोच रहा था कहाँ ले जाऊं होटल जाने का कोई फायेदा नहीं पहले तो मुझे खाने नहीं देगी बी पी, कोलेस्ट्रोल, सुगर सबका नाम ले लेके, और मैं नहीं खाऊंगा तो खुद भी बिना खाए हीं वापस चली आएगी | सोचा घर पहुँच के पहले उसका तोहफा देखता हूँ है क्या | पता है उस सुन्दर से पैकेट में क्या निकला ? जूता वो भी आठ नंबर का जबकि मैं पहनता हूँ नौ नंबर | पूछने पर उसने कहा क्या! आठ नंबर!! ओह वो क्या है ना चश्मा मैं घर पर हीं भूल गयी थी तो आठ को नौ  पढ़ लिया होगा, जाके बदलना पड़ेगा वरना चार हज़ार डूब जायेंगे | सुबह वो शेरनी बनी थी अब दहाड़ने की बारी मेरी थी मै पूरी ताकत से चिल्लाया "क्या! चार हज़ार ? दिमाग तो ठीक है तुम्हारा ? अरे इतने महंगे जूते तो मैंने अपनी शादी में भी नहीं पहने | सुबह की शेरनी भीगी बिल्ली बनके खड़ी थी धीरे से बोली "स्कूटर निकालिए ना चल के बदल लेते हैं ऑटो से तो पचास रूपए लग जायेंगे, वो जो नया वाला मॉल खुला है ना वहीँ से लायी थी" | अब क्या कर सकता था स्कूटर से मॉल गए और वहाँ जा के पता चला मुझे तोहफे का मूल्य मालुम ना पड़े इसलिए उसने डब्बे पे से दाम वाले स्टीकर को हटा दिया था और कैश मेमो उसी दिन फेंक चुकी थी, मॉल की पॉलिसी के तहत अब उस माल को लौटाया नहीं जा सकता था | वो बेचारी तो पहले से हीं आत्मग्लानि के बोझ से दबी खड़ी थी और मैं चार हज़ार के झटके के बाद उस वक़्त कुछ कहने की स्थिति में नहीं था | मौन व्रत धारण किये हम दोनों घर आये और यूँही चार हज़ार के शोक में मौन व्रती हीं बने रह गए | यही रहा मेरे प्रथम वेलेंटाइन डे का अनुभव ""  

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

ज़ेर-ए-लब भी हम शिकायत कर ना सके


दर्द-ए-दिल कागज़ पर हम रचते रहें
वे खुश होकर पढ़ते, तारीफ़ करते रहे 
                                                                         
कह कह कर कातिलाना हमारी गजलों को 
हँस के तारीफों से क़त्ल हमारा करते रहें

कसीदे पढ़ते रहें हम उनकी अदाओं के 
वे बस कलम की कारसाजी पर मरते रहे 

कायल थे वे हमारी हीं दास्तान-ए-दर्द के 
तभी तो फ़सुर्दगी के आलम भेंट करते रहे

ज़ेर-ए-लब भी हम शिकायत कर ना सके
पर वे तो भरे बज्म में भी तंज़ कसते रहे 

आशियाँ तो वे कहीं और हीं बसा चुके थे 
और हम दर पे उनके इंतज़ार करते रहें 

सोचा मर जाएँ उनके संग-ए-आस्तां पर 
 क्या करें उनकी रुसवाइयों से डरते रहे