चिंतन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
चिंतन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 22 अप्रैल 2018

रेप करने से बचने के कारगर उपाय

"यह मेसेज हर उस लड़की को भेजें जिससे आप प्यार करते हैं, जिनकी आप इज्ज़त करते हैं। देश की हर एक लड़की तक आज इस सन्देश का पहुँचना ज़रूरी है।"

ऐसा कोई न कोई मैसेज अक्सर घूमफिर कर हमारे पास विभिन्न माध्यमो से पहुँचता हीं रहता है। यदि यौनशोषण, महिला-उत्पीड़न जैसी कोई ख़बर सुर्ख़ियों में आ जाये, फिर तो ऐसे संदेशों की बाढ़-सी आ जाती है। ऐसे संदेशों को पढ़ कर मुझे ऐसा महसूस होता है जैसे देश की आधी आबादी दूसरी आधी आबादी के ख़िलाफ़ कोई षड्यंत्र रच रही है। अरे बाबा जब देश-समाज सबका है तो फिर सारे ब्रह्मज्ञान सिर्फ़ लड़कियों को क्यों? केवल लड़कियों के लिए रेप और मोलेस्टेशन से बचने के लिए टिप्स क्यूँ तैयार किये जाते हैं? बेचारे लड़कों सॉरी मेरा मतलब था 'मर्दों' को भी तो कोई टिप्स की लिस्ट तैयार करके दो कि रेप और मोलेस्टेशन जैसे घृणित काम करने से ख़ुद को कैसे बचाएँ!

वैसे एक बात ईमानदारी से बताऊँ? अभी सशक्त महिलाएँ और फेमिनिस्ट (ये फेमिनाज़ी) लडकियाँ मुझे इस बात के लिए घेर सकती हैं फिर भी ये रिस्क लेकर मैं सच कहना चाहूँगी। लडकियाँ चाहे कितना भी रो गा लें, कितना भी प्रोफाइल पिक्चर काली-पिली कर लें या चाहे जितने भी फेमिनिज्म वाले झंडे गाड़ लें, उनके औकात से बाहर की चीज़ है रेप जैसी चीजों को समाज से ख़त्म करना। हाँ सच कहती हूँ, समाज के इस घिनौने चेहरे को बदलने का दारोमदार मर्दों को हीं अपने मज़बूत कंधों पर लेना पड़ेगा।

कोई और तो लिख नहीं रहा था तो मैंने सोचा मैं हीं अपने समाज के मर्दों के मार्गदर्शन के लिए रेप और मोलेस्टेशन करने से बचने के लिए कुछ टिप्स लिख देती हूँ। आप सब से गुज़ारिश है कि इसे हर उस मर्द के साथ साझा करें जिसकी आप 'केयर' करते हों क्यूँकी लड़कियों का तो शरीर और मन हीं आहत होता है, रेप करने वाले मर्दों की तो आत्मा तक मलीन हो जाती है। उन्हें तो पता भी नहीं चलता कि मर्दानगी के धोखे में कब वह इन्सान से हैवान बन गए.

चलिए अब फटाफट बढ़ते हैं रेप और मोलेस्टेशन करने से बचने के उपायों की तरफ़...

1. पब्लिक प्लेस पर मोबाइल का इस्तेमाल कम से कम करें – स्मार्टफोन के इस ज़माने में आपको मोबाइल फ़ोन न रखने की सलाह तो नहीं दूँगी, लेकिन, आपको इसका इस्तेमाल काफ़ी सोच समझ कर करना चाहिए. यदि आप किसी पब्लिक प्लेस पर हैं तो ध्यान रखें आपको मोबाइल का प्रयोग सिर्फ़ निहायत ज़रूरी सुचना के आदान-प्रदान के लिए करना चाहिए. whatsapp और facebook जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल तो बिलकुल भी न करें। वह क्या है न कि हर मर्द की ज़िन्दगी में बीसियों उदार भाव के मित्र होते हैं... इनसे अकेले कुछ हज़म हीं नहीं होता। अब बताइए जब आप पब्लिक प्लेस पर हों और आपके उदार मित्र सनी जी की बहनों वाली विडियो या फिर वह भाभी जी वाली हीं विडियो या चुटकुले भेज दें तो आपका तो मन करेगा ही न अगल-बगल से गुज़रती लड़कियों के कपड़ों के भीतर तक झाँक लेने का! और उन्हें छू लेने का भी! आपको अपने आँखों का इस्तेमाल एक्स-रे मशीन की तरह न करना पड़े इसके लिए बेहद ज़रूरी है सार्वजनिक स्थलों पर मोबाइल का इस्तेमाल आपातकालीन स्थिति में हीं करें।

2. हमेशा अपने साथ एक फैमिली एल्बम रखें – विज्ञान कहता है कि लड़कों का दिमाग 'विजुअल' होता है... किसी चीज़ को देख कर वह ज़्यादा अच्छे से समझ पाते हैं। इसलिए ज़रुरी है कि आपके पास हर वक़्त कोई विजुअल हिंट मौज़ूद हो। आप चाहें तो छोटा-सा फैमिली एल्बम रख सकते हैं या चाहें तो अपने मोबाइल में भी ये एल्बम बना कर रख सकते हैं। ध्यान रहे यदि आप मोबाइल में एल्बम बनाते हैं तो वह आपके फ्रंट स्क्रीन पर हो जिसे आप सिंगल टैप से खोल सकें। इस एल्बम में आपकी, आपके पिता या भाईयों की तस्वीर हो न हो माँ, बहन, भतीजी आदि सभी स्त्रीयों की तस्वीर हो जिनके साथ आपके मन का जुड़ाव हो। जब भी आपके दोस्त या आपका खुद का मन राह चलती किसी 'माल' को 'ताड़ने' के लिए आपको उकसाए तुरंत वह एल्बम खोलिए. सामने दिख रही माल और फोटो एल्बम में दिख रही माल के शारीरिक संरचना के बीच तुलना करना शुरू कीजिये। हाँ बाबा मालूम है फोटो एल्बम में आपकी माँ या बहन है पर बाकियों के लिए वह भी तो माल है न जैसे ये राह चलती लड़की आपके लिए? So, don' t take it personally! राह चलती लड़कियों में कौन ज़्यादा टंच माल है ये एनालिसिस तो आप अक्सर करते हैं... वही काम तो अब भी करना है बस अपने जीवन की अहम् औरतों के साथ! विश्वाश कीजिये आँखों में शर्म का पानी लाने के लिए यह नुस्खा बहुत कारगर है।

3. अपने दायित्वों का दायरा बढ़ायें – आपके दायित्वों का दाएरा काफ़ी छोटा है और बेशक इसके लिए आप अपने परिवार की महिलाओं को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। खाना देने, जूठी प्लेट उठाने, टी.वि। चलाकर रिमोट पकड़ाने, कपड़े धुलने, यहाँ तक कि समय पर जगा देने के लिए भी आप अपने घर की महिलाओं जैसे माँ, बहन, भाभी, बीवी आदि पर निर्भर होते हैं। शुरू से ऐसा करते-करते आपको पता हीं नहीं चलता कि आप कब अपनी हर छोटी से छोटी ज़रूरतों के लिए किसी न किसी महिला पर निर्भर हो गए. इस पर-निर्भरता को आप अनजाने हीं अपना हक़ समझने लगते हैं। आपको ऐसा लगता है कि महिलाओं का दायित्व है आपका हर काम करना, आपकी इच्छा-अनिच्छा के हिसाब से चलना। यही कारण है कि किसी कारणवश जब आपके शरीर का एक हिस्सा बेचैन होता है तो आपको लगता है सामने दिख रही महिला का ये दायित्व है कि वह आपकी बेचैनी को शांत करे। शुरुवात अपने छोटे-छोटे कामों का दायित्व स्वयं लेने से करें और 'अपना हाथ जगन्नाथ' के कॉन्सेप्ट को अपने जीवन में उतारें। अपनी ज़रूरतों का दायित्व ख़ुद वहन करना सिख लेंगे तो आपको बलात्कार जैसे घृणित मार्ग को चुनने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

4. हमेशा अपने साथ पानी की एक बोतल रखें – पानी प्रकृति के द्वारा दी गयी एक अति-महत्त्वपूर्ण जीवनदायिनी सम्पदा है। इसकी ज़रूरत इंसान को कभी भी कहीं भी पद सकती है इसलिए एक पानी की बोतल हमेशा अपने साथ रखें। हमारे वातावरण में एक बहुत हीं ख़तरनाक वायरस घुस गया है जो किशोर से लेकर वृधावस्था तक के मर्दों को अपनी चपेट में ले रहा है। जब तुम्हारी कामुकता छोटी-छोटी बच्चियों को देखकर भी हिलोरें मारने लगें तब समझ लेना तुम उस जानलेवा वायरस की चपेट में आ चुके हो। जब तुम्हारा मन उन नन्हीं कलियों को मसल देने का होने लगे जिनके यौनांग अभी विकसित तक नहीं हुए तब समझ लेना तुम्हारी बीमारी अपने चरम तक पहुँच चुकी है। उस स्थिति में तुम्हें ये समझ लेना चाहिए कि तुम्हें जल्द से जल्द ईलाज की ज़रूरत है। ये ईलाज सिर्फ़ पानी से हीं हो सकता है। ऐसी स्थिति में पानी की तलाश में भटकना न पड़े इसलिए पानी की बोतल तुम्हारे पास होनी हीं चाहिए. जैसे हीं तुम्हारे मन में ऐसी घृणित बात आये अपने बोतल से चुल्लू भर पानी निकालो और उसमें डूब मरो। हाँ सच में इसका बस यही ईलाज है!

फ़िलहाल इन चार नुस्खों को अपने जीवन में इस्तेमाल करें ज़रूरत पड़ी तो हम आगे भी आपके मार्गदर्शन के लिए तत्पर रहेंगे। बहुत महत्त्वपूर्ण ज्ञान है इसलिए इसे स्वयं तक सीमित न रखें जितने ज़्यादा से ज़्यादा मर्दों से हो सके इसे साझा करें। बलात्कार-मुक्त भारत आपके सहयोग के बिना बनना नामुमकिन है। 

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

सोचता हूँ...



जब-जब किसी की चिता की लपटों को देखता हूँ...
होगा कैसा मेरे जीवन का अंत तब-तब ये सोचता हूँ !

पंच तत्वों में विलीन तो यह नश्वर शरीर होगा हीं...
सोचता हूँ आत्मा उसके अंजाम तक पहुंचेगी या नहीं?
 
वेद-विदित है ये परंपरा हमारी सब ऐसा  कहते हैं
मुखाग्नि देते बेटे, और तर्पण भी वही करते हैं

सुना है तब जाकर कहीं आत्मा को शान्ति मिलती है...
वर्ना सदियों तक वह बैतरनी में भटकती रहती है!

अरमानों से प्यारी बिटिया को ऐसे में जब देखता हूँ ...
बड़ी बेचैनी से उस हालात में मैं यह सोचता हूँ... 

जिसकी मासूम मुस्कान जीवन का हर दुःख हर लेती है
हाथों के कोमल स्पर्श से जो बेचैनी में भी सुकून देती है

वह मुखाग्नि दे  तो क्या चिता जलने से इनकार कर देगी?
उसके हाथों का तर्पण क्या आत्मा अस्वीकार कर देगी??

सोमवार, 19 सितंबर 2016

हरिजन बनाम दिव्यांग-जन: प्रधानमंत्री के नाम एक खुला ख़त


परम आदरणीय
श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी
देश के वर्तमान प्रधानमन्त्री (स्वकथित प्रधान सेवक)

महाशय,
कहना चाहूँगी कि एक राजनीतिज्ञ के रूप में यह अति प्रशंसनीय है कि पार्टी से ऊपर उठ कर आपने देश के महान राजनेता को तवज्जो दिया और स्वच्छ भारत अभियान को गाँधी जी के सपने के रूप में प्रचारित करके आगे बढ़ाया। किसी महान व्यक्ति के पदचिन्हों पर चलना अच्छी बात है पर ये जरुरी तो नहीं कि उसकी की हुई गलती को भी हम दोहराएँ?

हमारे देश के महान राजनीतिज्ञ श्री मोहनदास करमचन्द गाँधी ने दलितों के उत्थान के नाम पर उन्हें ‘हरिजन’ बना दिया, ठीक उसी प्रकार आपके मन में बात आई और आपने विकलांगों को ‘दिव्यांग-जन’ की उपाधि दे डाली। वैसे मैं आप दोनों में से किसी भी राजनीतिज्ञ की मंशा पर संदेह नहीं कर रही (हो सकता है उनसे गलती हुई और आपने सिर्फ उसे दोहराया)  परन्तु कहीं न कहीं तो आप दोनों हीं असल मुद्दे से भटके हैं। गाँधीजी तो बीता कल हो चुकें हैं और कागज़ी तौर पर हरिजन शब्द के प्रयोग पर रोक भी लग चूका है परन्तु आप हमारे वर्तमान प्रधानमन्त्री हैं इसलिए आपसे अनुरोध है कि असल मुद्दे को छोड़ कर न खुद भटकें और न हमें गुमराह करने की कोशिश करें।

हरिजन और दिव्यांग-जन ये दोनों ही नाम भ्रमित करने वाले हैं। गाँधीजी ने मुख्यधारा से काटे गए तथाकथित नीची जाति के लोगों को नाम दिया ‘हरिजन’ मतलब हरी/भगवान का जन। क्या सिर्फ नीची जाति के लोग भगवान के जन होते हैं? यह तो आप भी समझते होंगे की यह नाम सिर्फ उन दलितों को सांत्वना के रूप में दिया गया था कि तुम(भी) ईश्वर की संतान हो। असल मायेने में समाज के अन्दर हरिजन भी उतना ही अपमानजनक शब्द है जितना अछूत या अश्पृश्य और इसीलिए हरिजन शब्द के प्रयोग पर सरकारी तौर पर रोक भी लगानी पड़ी। जब उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का वक़्त था उसी वक़्त हरिजन नाम से ऐसी राजनीति हुई कि मुख्यधारा में आकर भी हरिजन समाज का एक अलग-थलग पड़ा हुआ अंग है।  शाब्दिक अर्थ देखें तो हरिजन के अर्थ में अपमानजनक कुछ भी नहीं बल्कि ये तो सम्मानसूचक शब्द है (और गाँधी जी ने यही समझाया भी था)। पर समाज में रहते हुए यह समझ में आता है कि हरिजन ठीक उसी प्रकार अपमानजनक है जिस प्रकार ‘माँ की आँख’ जैसी गालियाँ, जिनके शाब्दिक अर्थ में कुछ भी बुरा नहीं पर फिर भी इनमें क्या बुरा है ये तो सबलोग जानते हैं। आपका सुझाया हुआ शब्द ‘दिव्यांग-जन’ अपमानजनक न हो फिर भी हरिजन की तरह ही भ्रमित करने के साथ-साथ मुख्यधारा से हमेशा के लिए काट के एक अलग श्रेणी में बाँटने वाला शब्द है। दिव्यांग का अर्थ है जिसके अंग(अंगों) में दिव्य शक्ति हो। इस शब्द के प्रयोग के लिए आपने व्याख्या भी दी है कि किसी एक अंग के काम न करने की स्थिति में उसकी क्षतिपूर्ति के लिए प्रायः विकलांग व्यक्ति का कोई दूसरा अंग ज्यादा सक्रीय (दिव्य शक्तियों से युक्त) हो जाता है इसलिए उस अंग को ध्यान में रख कर उन्हें दिव्यांग कहा जाना चाहिए। मैं यहाँ आपसे कहना चाहूँगी कि भगवान हमें किसी ‘स्पेशल पैकेज’ के अंतर्गत ऐसी किसी दिव्य शक्ति का वरदान देकर नहीं भेजते। हम विकलांगजन अपने-अपने शरीर की कमियों के साथ जीने और समाज के मापदंडो पर खरे उतरने के लिए हर दिन संघर्ष करते हैं। कृपया हमारे संघर्ष, हमारी मेहनत का श्रेय किसी दिव्य शक्ति (जो हमें मिली नहीं है) को न दें। विकलांग होना कोई दिव्य अनुभव नहीं होता। दिव्य इंसान बता कर हमारे कष्टों को महिमामंडित करने के बजाये हमारे संघर्षों को कम करने पर ध्यान दें तो ये न सिर्फ हमारे लिए बल्कि पूरे देश के लिए श्रेयष्कर होगा। आपको यह समझना चाहिए कि शरीर की कमी से ज्यादा आधारभूत संरचनाओं की कमी व्यक्ति को विकलांग बनाती है। अगर मैं किसी सार्वजानिक कार्यालय में जाऊं और वहाँ केवल सीढ़ियाँ हो तो मैं विकलांग हूँ क्यूंकि दूसरों की मदद के बगैर मैं वहाँ अपना काम नहीं कर पाऊँगी। वहीँ दूसरी तरफ़ अगर उस सार्वजानिक कार्यालय में रैंप भी बने हो, तो मैं विकलांग नहीं हूँ क्यूँकी सामान्य लोगों की तरह ही मैं भी अपना काम खुद कर पाऊँगी।  

वैसे हमें ‘दिव्य’ मानव बनाने का विचार आपके दिमाग में आया कैसे? मेरे मन में एक शंका है...बुरा न मानें तो पूछूँ? अक्सर देखा है, ख़ास करके गांवों में, कुछ लोग विकलांगता को पूर्व जन्म के पाप का फल मानते हैं और विकलांगों से दूरी बना कर रखना चाहते हैं। वहीँ दूसरी ओर बहुत से लोग (खुद को ज्यादा समझदार और संवेदनशील मानने वाले) हम विकलांगों को ईश्वर का भेजा ख़ास दूत मानते हैं जो धरती पर उनके पापों का नाश करके उन्हें सीधे स्वर्ग का टिकट देने आयें हैं। ऐसे लोग स्वर्ग में अपनी जगह सुनिश्चित कराने के लिए अपने ख़ास दिनों में विकलांग व्यक्ति को कुछ ‘दान’ देते हैं और कहीं सड़क पर दिख जाने वाले विकलांग को प्रणाम करके अपने लिए मोक्ष का द्वार खोलते हैं। कहीं आप भी तो ऐसा... नहीं मानते न! अरे नहीं आप तो पढ़े-लिखे और बहुत समझदार इंसान हैं आप भला ये सब थोड़ी मानते होंगे। बस मन में एक जिज्ञाषा हुई तो पूछ लिया। देखिये आपके और समाज के तथाकथित सामान्य लोगों की तरह ही हम भी साधारण से इंसान हैं। हम ईश्वर के कोई दूत या स्पेशल पैकेज ले कर आये कोई दिव्य मानव नहीं हैं। यदि हमें समाज में कोई ख़ास इज्ज़त दिलाने के धेय से आपने दिव्यांग शब्द का ईज़ाद किया है तो विनम्रता पूर्वक कहती हूँ दिव्यांग जैसे हजारों शब्द भी हमें समाज में वो इज्ज़त नहीं दिला सकते क्यूँकी इज्ज़त कमानी पड़ती है। देश के प्रधानमन्त्री होने के नाते आप हमें आधारभूत संरचना और समान अवसर दें, हम समाज में अपनी पहचान और इज्ज़त बनाने का दम रखते हैं।

आलोकिता (एक विकलांग लड़की)   


गुरुवार, 2 अगस्त 2012

बहन-रक्षा का प्रण लेने की जरुरत नहीं


अभी पिछले हीं दिन अखबार में छपी एक खबर में पढ़ा था बारहवीं की एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मुख्य नामजद अपराधी प्रशांत कुमार झा तीन बहनों का भाई है, उसकी बहन के बयान से शर्मिंदगी साफ़ झलक रही थी और छोटी बहन तो समझ भी नहीं पा रही उसके भाई ने किया क्या है | बस यही सोच रही थी की आज राखी के दिन क्या मनः  स्थिति होगी ऐसी बहन की जिसका भाई बलात्कार के जुर्म में जेल गया हो ...............

तेरे हिस्से की राखी आज जला दी मैंने 
इस बंधन से तुझको मुक्ति दिला दी मैंने 
अफ़सोस तेरी बहन होने के अभिशाप से छुट ना पाउंगी 
अपनी राखी की दुर्बलता पर जीवन भर पछ्ताउंगी 
मुझ पर उठी एक ऊँगली, एक फब्ती भी बर्दास्त ना थी 
सोचती हूँ कैसे उस लड़की का शील तुमने हरा होगा ?
वर्षों का मेरा स्नेह क्यूँ उस वक़्त तुम्हे रोक सका नहीं? 
क्यूँ एक बार भी उसकी तड़प में तुम्हे मेरा चेहरा दिखा नहीं?
इतनी दुर्बल थी मेरी राखी तुझको मर्यादा में बाँध ना सकी 
शर्मशार हूँ भाई, कभी तेरा असली चेहरा पहचान ना सकी
उधर घर पर माँ अपनी कोख  को कोस कोस कर हारी है
तेरे कारण हँसना भूल पिता हुए मौन व्रत धारी हैं 
सुन ! तेरी छुटकी का हुआ सबसे बुरा हाल है 
अनायास क्यूँ बदला सब, ये सोच सोच बेहाल है
छोटी है अभी 'बलात्कार' का अर्थ भी समझती नहीं 
हिम्मत नहीं मुझमे, उसे कुछ भी समझा सकती नहीं 
पर भाई मेरे, तु तो बड़ा बहादुर है, मर्द है तु 
उसको यहीं बुलवाती हूँ , तु खुद हीं उसको समझा दे 
बता दे उसे कैसे तुने अपनी मर्दानगी को प्रमाणित किया है 
और हाँ ये भी समझा देना प्यारी बहना को, वो भी एक लड़की है 
किसी की मर्दानगी साबित करने का वो भी जरिया बन सकती है 
अरे ये क्या, क्यूँ लज्जा से सर झुक गया, नसें क्यूँ फड़कने लगीं ?
यूँ दाँत पिसने , मुठ्ठियाँ  भींचने से क्या होगा ?
कब-कब, कहाँ-कहाँ, किस-किस से रक्षा कर पाओगे?
किसी भाई को बहन-रक्षा का प्रण लेने की जरुरत नहीं 
खुद की कुपथ से रक्षा कर ले बस इतना हीं काफी है 
जो मर्यादित होने का प्रण ले ले हर भाई खुद हीं 
किसी बहन को तब किसी रक्षक की जरुरत हीं क्या है?  

   

मंगलवार, 12 जून 2012

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है



















जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

शमा भी जलती चिता भी जलती 
जलती अगन दोनों में है 
औरों को रौशनी देने को शमा जलती,
कतरा-कतरा पिघलती है 
भष्म करके कई खुशियों अरमानो को हीं 
चिता कि लपटों को शान्ति मिलती है 
ज्योत शमा की चमक लाती नयनो में 
चिता की दाह अश्रुपूर्ण कर जाती है

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

उसी आग से जलता चूल्हा 
उसी से जलती भट्टी शराब की 
एक चूल्हे का जलना 
कई दिलों में ख़ुशी होठों पे हंसीं लाता है 
जलती जब एक शराब की भट्टी 
कितनो का घर लुट जाता है 
चूल्हे का जलना छुधा को तृप्ति पहुँचाता 
भट्टी स्वयं कितनी जिंदगियां, कितने रिश्तों को पी जाती है 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

जितनी पावन सात फेरों की अग्नि 
उतनी हीं पापिन दहेज़ की अग्नि 
जन्म-जन्मान्तर के रिश्ते में बांधती 
बनती सात वचनों की साक्षी फेरों की अग्नि 
रिश्ते हीं नहीं शर्मशार करती मानवता को भी 
बहुओं को जिन्दा जलाती दहेज़ की अग्नि 
इक गढ़ती नित नव रिश्ते
दूजी फूंकती प्रेम की डोरी 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

बीड़ी-सिगरेट के सिरे पर जलती छोटी लाल सी चिंगारी 
और जलती पूजा घर के धुप में भी 
दम घोंटता बीड़ी-सिगरेट का धुआँ 
मौत का दूत बन जाता है 
सुवासित करता धुप चहु दिशाओं को 
मानसिक सुकून भी पहुँचाता है 
इक कदम दर कदम मौत की तरफ ले जाता 
दूसरा आस्था का प्रतीक बन टिमटिमाता है 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

प्रेम की अग्नि जलती दिलों में 
विरहाग्नि दिलों को जलाती है 
मिलन भी उतपत करता जिस्मो-ओ-जिगर को 
विरह की ऊष्मा भी जलाती है 
हो इकतरफा भी लगी अगन तो
ताप दूजे तक भी जाती है 
जलना ये भी कहलाता है 
जलना वो भी तो होता है 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है

.....................................................आलोकिता गुप्ता      

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

आखिर कब तक ?

हमारे देश में हमेशा से असमानता को हटाये जाने का प्रयास होता रहा है लेकिन यह 'असमानता' जाने कबतक हमारे देश के अस्तित्व से चिपकी रहेगी ? कब तक भेद भाव का सामना करना पड़ेगा समाज के विभिन्न वर्गों को ? कभी जातियता , कहीं लिंग तो कभी अमीरी और गरीबी का भेद भाव, खैर इन विषयों पर तो अक्सर विचार विमर्श होते हीं रहते हैं पर अक्षमता और सक्षमता के आधार पर भी भेद भाव होते रहते हैं लेकिन इस विषय पर चर्चाएँ भी काफी कम होती हैं |


 अभी हाल हीं का एक उदाहरण ले लीजिये जब जीजा घोष को हवाई जहाज में चढ़ के बैठ जाने के बाद सिर्फ इसलिए उतार दिया गया क्यूंकि वो एक अक्षम महिला हैं और उस जहाज का चालक उत्प्रभ तिवारी चाहता था कि उन्हें उतार दिया जाए | ये तो वही रंग भेद वाली जैसी बात हो गयी ना, या कहें उससे भी बढ़ कर, क्यूंकि गांधी जी को जब गोरों के डब्बे से उतारा गया था उस वक़्त अश्वेत लोगों के लिए अलग डब्बे होते थे रेल गाडी में, और इस बात की खबर भी होती थी उन्हें, कि उनके लिए अलग डब्बे निर्धारित किये गए हैं यहाँ तो वो भी नहीं है | यह दुर्व्यवहार की घटना महज जीजा घोष के साथ हीं नहीं हुई अपितु आये दिन अक्षम व्यक्तियों को ऐसे भेद भावों का सामना करना पड़ता है | 


महिला सशक्तिकरण, समाज में महिलाओं की हिस्सेदारी और भागीदारी की बात तो आज कल चर्चा-ए-आम है और उन्ही चर्चाओं में अक्सर कुछ वाक्यांशों का प्रयोग किया जाता है जैसे 'औरत कोई वस्तु नहीं' या 'औरत सिर्फ एक शरीर नहीं' ये बातें महज औरत नहीं बल्की हर इंसान पर लागू होती हैं | किसी भी इंसान के लिए वस्तु या बेजान शरीर मान कर किया गया व्यवहार उतना हीं कष्टकारी होता हैं | बेशक इंसान का मतलब केवल सक्षम व्यक्ति नहीं होता | विकलांगता प्रमाण पत्र धारी व्यक्ति भी कोई वस्तु नहीं जिसे किसी की भी मर्ज़ी से कहीं से भी हटा दिया जाए | विकलांग व्यक्ति मात्र एक विकृत शरीर नहीं वो भी एक इंसान है जिसमे सोचने की समझने की सुख दुःख महसूस करने की क्षमता है | जीवन के कदम कदम पर जब किसी विकलांग व्यक्ति को ऐसे भेद भावों का सामना करना पड़ता है तो एक आम इंसान की तरह उसका भी दिल दुखता है उसकी भी भावनाएं जख्मी होती हैं क्यूंकि उसके भी दिल में आम इंसान के जैसे हीं जज्बात होते हैं | 


जीजा घोष जैसी घटनाएं ना सिर्फ उस पीड़ित व्यक्ति के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती हैं बल्की हज़ारों अक्षम लोगों के आत्मबल को तोड़ देती हैं | अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद खुद को सामाजिक  मानदंडो पर सक्षम साबित कर देने के बावजूद भी जब किसी को आत्मसम्मान के साथ जीने का हक नहीं मिलता तो इसे मानवीय अधिकारों का हनन नहीं तो और क्या कहेंगे? ऐसी घटनाएं मात्र मानवीय नहीं अपितु कानूनी अधिकारों का भी हनन है | जीजा घोष इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ सेरेब्रल पाल्सी  की विकलांगता अध्ययन की अध्यक्षा हैं और उनके साथ हुआ यह दुर्व्यवहार साफ़ तौर पर हमारे समाज की पिछड़ी हुई मानसिकता को दर्शाता है | जब हमारे देश के इतने पढ़े लिखे और तथाकथित समझदार लोगों के बीच ऐसी घटनाएं होती हैं तो एक बार ध्यान अपनी शिक्षा प्रणाली पर जरुर जाता है क्यूंकि कहते हैं 'विद्या ददाति विनयम' , उत्प्रभ तिवारी जैसे लोगों को कैसी विद्या दी गयी है जिसमे विनय है हीं नहीं ? ऐसी शिक्षा का क्या फायेदा जो एक मानव के भीतर मानवीयता को हीं ना जगा पाए? 


ऐसी परिस्थितियों में कई सवाल मन में दस्तक देते हैं | आखिर कब तक शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को अपना स्वाभिमान खोकर जीना पड़ेगा?कब आएगी वो संवेदनशीलता हमारे समाज में जब इंसान को इंसान के रूप में देखा जाएगा? कब आएगा वो दिन जब हर किसीको उसका अधिकार मिल पायेगा ? आखिर कब?  
       

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

बेटी हूँ


















सुन लो हे श्रेष्ठ जनों 
एक विनती लेकर आई हूँ 
बेटी हूँ इस समाज की 
बेटी सी हीं जिद्द करने आई हूँ 
बंधी हुई संस्कारों में थी 
संकोचों ने मुझे घेरा था 
तोड़ के संकोचों को आज 
तुम्हे जगाने आई हूँ 
बेटी हूँ 
और अपना हक जताने आई हूँ 
नवरात्रि में देवी के पूजन होंगे 
हमेशा की तरह 
फिर से कुवांरी कन्याओं के 
पद वंदन होंगे 
सदियों से प्रथा चली आई 
तुम भी यही करते आये हो 
पर क्या कभी भी 
मुझसे पूछा ?
बेटी तू क्या चाहती है ?
चाहत नहीं 
शैलपुत्री, चंद्रघंटा बनूँ 
ब्रम्ह्चारिणी या दुर्गा हीं कहलाऊं 
चाहत नहीं कि देवी सी पूजी जाऊं 
कुछ हवन पूजन, कुछ जगराते 
और फिर .....
उसी हवन के आग से 
दहेज़ की भट्टी में जल जाऊं 
उन्ही फल मेवों कि तरह 
किसी के भोग विलास  को अर्पित हो जाऊं
चार दिनों की चांदनी सी चमकूँ
और फिर विसर्जीत  कर दी जाऊं
नहीं चाहती
पूजा घर के इक कोने में  सजा दी जाऊं 
असल जिन्दगी कि राहों पर 
मुझको कदम रखने दो 
क्षमताएं हैं मुझमें 
मुझे भी आगे बढ़ने दो 
मत बनाओ इतना सहनशील की 
हर जुल्म चूप करके सह जाऊं 
मत भरो ऐसे संस्कार की 
अहिल्या सी जड़ हो जाऊं 
देवी को पूजो बेशक तुम 
मुझको बेटी रहने दो 
तुम्हारी थाली का 
नेह  निवाला कहीं बेहतर है
आडम्बर के उन फल मेवों से 
कहीं श्रेयष्कर है 
तुम्हारा प्यार, आशीर्वाद 
झूठ मुठ के उस पद वंदन से  

बुधवार, 2 मार्च 2011

निशब्दता



न कहो कुछ आज, .....चुप हीं रहना 
न सुनना हैं मुझे..... न कुछ हैं कहना 

लफ्जों से परे मौन जगत में खोने दो 
न रोको अश्कों को, जी भरके रोने दो 

जैसे विचरता है जलद नील गगन में 
चलो विचरें हम भी स्वप्न आँगन  में 

भूलकर  कुछ देर को गतिहीन हो जाएँ 
चलो ऐसा करे मौन जगत में खो जाएँ



चलो सूने में निहारे निर्बाध नयनों से 
ढूंढे स्वयं का अस्तित्व भी अंतर्मन से 


बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

विभावरी की गोद में निमग्न सोया है
सब चिंताएं छोड़ मधुस्वप्न में खोया है
ख्वाबों में हीं देखकर मुझे मचलता है
हाथ बढ़ा कर पा लेने को तड़पता है
ख्वाबों से निकल देख मैं यथार्थ में हूँ
द्वार पर खड़ी कब से तुझे पुकारती हूँ
जिसकी तुझे तलाश थी मैं सुअवसर हूँ वही
आज खड़ी तेरे द्वार पर तुझे ज्ञात  हीं  नहीं
अरे ओ द्वार तो खोल तुझसे हीं कहती हूँ
चल उठ मैं तुझे मंजिल तक ले चलती हूँ


मैं जाती हूँ गर मुझसे प्यारी है नींद तुझे
प्रातः जब नींद  खुलेगी मत  ढूँढना  मुझे
देखकर  मुझे  किसी  और  के  साथ
अपनी मंजिल देख किसी और के हाथ 
मत रोना भाग्य पर मत कोसना मुझे
कोसना आलस्य को उठने न दिया तुझे 

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

बधाई हो घर में लक्ष्मी आई है

उन्हें कभी एकमत
होते नहीं देखा था 
उस दिन जब वह 
जन्मी थी 
कुछ जोड़े नयन 
सजल थे 
कुछ की आँखें 
चमक रही थी 
कोई आश्चर्य नहीं था 
क्यूंकि 
उन्हें कभी एकमत 
होते नहीं देखा था 
पर एक आश्चर्य 
उस दिन सबने 
सुर मिलाया 
शुभचिंतकों ने ढाँढस
दुश्चिन्तकों ने व्यंग्य कसा 
बधाई हो 
घर में लक्ष्मी आई है 

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

बचा लो जान खतरे में है !!!!!

जी हाँ आज वाकई में हमारी हिंदुस्तान कि भाषा हिंदी कि जान खतरे में है, और इसे बचाना हमारे हीं हाथों में है | किताबों में पढ़ा था कि हमारी हिंदी का स्वभाव बहुत ही सरल है ये दूसरी भाषाओं के शब्द भी खुद में मिला कर उसे अपना लेती है | इस चीज़ को सिर्फ पढ़ा नहीं अपितु व्यावहारिक जीवन में भी देखा है, लेकिन अब हम इसकी सरलता का उपयोग नहीं दुरूपयोग कर रहे हैं | 
आज कल हमारी भाषा कैसी हो गयी है :-
 कैसे हो ?
 fine. तू बता everything okay ?
yaa but थोडा परेशान हूँ job को लेकर 
और ऐसी ही वार्तालाप करके हमे लगता है कि हम तो हिंदी में बात कर रहे हैं | किसी भी भाषा का ज्ञान बुरा नहीं है | मैं अंग्रेजी के खिलाफ नहीं हूँ पर अंग्रेजी का जो कुप्रभाव पड़ रहा है हमारी हिंदी पर वह मुझे गलत लगता है | आज अंग्रेजी में राम बन गए हैं "रामा" बुद्ध बन गए हैं "बुद्धा" और टेम्स कि तर्ज़ पर गंगा हो गयी "गैंजेस" | अंग्रेजी माध्यम में पढने वाला कोई बच्चा अपने स्कूल में अगर गंगा कह दे तो मजाक का पात्र बन जायेगा | आज हम इतने पागल हो गए हैं अंग्रेजी के पीछे कि हिंदी का मूल्य हीं भूल गए हैं | अंग्रेजी को सफलता और विकास का पर्याय मान लिया गया है | क्या अंग्रेजी के बिना सफलता के मार्ग पर नहीं चला जा सकता ? वैसे तो बहुत से उदहारण हैं पर ज्यादा दूर जाने कि जरुरत नहीं हमारा पडोसी चीन क्या उसने अपनी भाषा छोड़ी ?नहीं | क्या वो हमसे पीछे रह गया ? नहीं | 
अंग्रेजी का इस्तेमाल हम मशीनी मानव कि तरह करते हैं, जो रटा दिया गया वही बोलते हैं, बिना किसी अहसास के | मगर हिंदी से हमारे अहसास जुड़े होते हैं | फ़र्ज़ कीजिये किसे ने हाल चाल पूछा तो हम कैसे भी हों कह देते हैं fine , लेकिन इसी बात को हम हिंदी में नहीं कह सकते कि बहुत बढ़िया हूँ | बहुत हुआ तो हम कह देंगे ठीक हूँ | कोई अन्जान भी मिले तो उससे बात करते हुए हम कह देतें हैं dear बिना ऐसा कुछ महसूस किये कि सामने वाला हमारे लिए dear है | पर क्या हिंदी में हम हर किसी को प्रिये कहते हैं ? नहीं , क्यूंकि ऐसा हम महसूस नहीं करते |    
तो जो भाषा हमारे अहसासों से जुड़ी हों उससे हम इतना दूर होते जा रहे हैं क्यूँ? सार्वजनिक जगहों पर हमे हिंदी का इस्तेमाल करने में शर्म आती है, ज्यादातर लोग अंग्रेजी का हीं इस्तेमाल करते हैं खुद को पढ़ा लिखा दिखाने के लिए | आज ज्यादातर युवा Chetan bhagat कि सारी पुस्तकें पढ़ चुके हैं पर हिंदी के उपन्यास के विषय में पुछो तो 'इतना टाइम किसके पास है' | इतनी दुरी क्यूँ आती जा रही है हिंदुस्तानिओं और हिंदी के बीच ? क्या इसका कोई हल है ? या यूँही दूर होते होते हिंदी और हिंदुस्तान का साथ छुट जायेगा ? क्या खतरे में पड़ी हिंदी कि जान को हम बचा पाएंगे ?
अगर हाँ तो गुजारिश है "बचा लो हिंदी कि जान खतरे में है |"              















रविवार, 26 दिसंबर 2010

विद्यालय

गुरुकुल से बना विद्यालय ,
विद्यालय अब हुआ वाणिज्यालय|
विद्या भी अब बिकती है संसार में ,
स्कूल और कोचिंग के बाज़ार में |
नैतिकता हुई बात पुरानी,
अनुशासन है एक कहानी |
गुरुजन अब हुए सौदागर ,
सौदा करते विद्या का जमकर |
बच्चों को अब अच्छाई सिखाये कौन ?
भटके हुओं को सत्मार्ग पर लाये कौन ?
विद्यालयों का हमे करना है जीर्णोधार ,
और है करना उच्च विचारों का संचार |
बढ़ानी है विद्यालयों की महिमा ,
हमे लौटानी है उनकी गरिमा |
तभी बनेगा हमारा देश महान ,
चहु दिशा में होगा गुणगान |

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

सुन्दर कौन ?














क्या है सबसे सुन्दर जग में ?
क्या है सबसे कुरूप ?
मन है सबसे सुन्दर जग में |
मन है सबसे कुरूप |
तन का क्या है, आज है गोरा 
कल काला हो सकता है 
काले को भी गोरे में बदला जा सकता है 
मेरी बात पर ज़रा गौर फरमाना 
इस शरीर को है एक दिन मर जाना 
मरने के बाद भी सुन्दर मन को याद करेगा जमाना 


(बहुत पहले मतलब बचपन में लिखी थी ये कविता, पर आज भी मुझे बेमानी नहीं लगी तो सोचा आप लोगों की भी प्रतिक्रिया देख लूँ )

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

सौर्य परिवार



















यूँ तो दुनिया में है अनेको परिवार ,
पर एक परिवार पर बसा है यह संसार |
नाम है जिसका सौर्य परिवार |

हर परिवार की तरह इसमें भी है एक पिता ,
पर न जाने गुम हो गयी है कहाँ माता |
पिता के हैं नौ प्यारे प्यारे बच्चे ,
सभी के सभी बहुत सच्चे और  अच्छे |
पिता को छोड़ कर कहीं नहीं है जातें |

यूँ तो मिली सबको एक परवरिश ,
पर धरती में है कुछ गुण औरों से हटके ,
तभी तो हम करोडो जीव आकर इससे चिपके |

काश ऐसा कुछ हमारे घरों में भी होता, 
सबसे बलवान हमेशा रहता पिता | 
बच्चे होते उनके भी प्यारे , 
बुढ़ापे में न लात मारें |

रविवार, 19 दिसंबर 2010

पिंजरबद्ध जिंदगानी

पिजड़े में बंद एक तोता हूँ मैं ,
हार वक़्त भाग्य पर रोता हूँ मैं |

पर होते हुए भी अपर रहना मेरी मज़बूरी,
मीठू-मीठू की रट लगाना भी जरुरी |

ये घर वाले जताते हैं मुझसे कितना प्यार ,
क्या इतना भयंकर और क्रूर होता है प्यार?

एक दिन मन में एक ख्याल आया ,
मैंने मुन्नी को बहुत बहलाया |

बोला, खोल दो यह पिंजड़ा अगर,
दो मिनट उड़ कर आ जाऊंगा अन्दर |

पर वह भी थी बड़ी सायानी ,
उसने मेरी एक न मानी|

बोली खोल दूँ पिंजड़ा तो उड़ जाओगे ,
वापस ना फिर यहाँ  तुम आओगे |

तुरंत एक ताला पिंजड़े में जड़ दिया ,
उड़ान को सपनो से भी दूर कर दिया |

शायद हर पिंजरबद्ध की है यही कहानी ,
हाय ! यह पिंजरबद्ध जिंदगानी |
    

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

चिता और चिंता






चिता में जलते हैं निर्जीव ,
चिंता से जलते सजीव |




कुछ घंटो में चिता की अग्नि शांत हो जाती ,
पर चिंता की अग्नि निरंतर बढती हीं जाती |


चिंता में जलता रहता है मानव ,
चिंता उसका खून पीती बनकर दानव |


अपना लहु देकर भी हमे कुछ मिल नहीं पाता,
चिंता में सर खपा कर भी कुछ हाथ न आता |


चिंता है एक मकड़  जाल, जिसमे मानव फंसता जाता,
अवनति रूपि दलदल में वह धंसता जाता |


हास्य-विनोद हीं इस चक्रव्यूह को है तोड़ सकता ,
चिंता से दूर कर खुशियों से हमारा नाता जोड़ सकता |



हास्य-विनोद से सब अपना नाता जोड़ो,
और आज से हीं चिंता का दामन छोड़ो |


सोमवार, 13 दिसंबर 2010

आँसु की कहानी

कल मैंने देखा एक सपना ,
सपने में रो रहा था कोई अपना |

वह थी हमारी धरती माता ,
हमसे है उनका गहरा नाता |

बहुत पूछने पर सुनाई आँसु की कहानी,
जिसे सुनने पर हुई मुझे हैरानी |

उन्हें नहीं था अपने बुरे हाल का  दुःख ,
नहीं चाहिए उनको हमसे कोई सुख |

उनकी गम का कारण थे हम ,
फिर भी हमारे लिए थी उनकी आँखे नम|

उन्होंने ने कहा मनुष्य बन रहे अपनी मृत्यु का कारण,
मेरे पास नहीं है इसका निवारण |

कभी मुझ पर हुआ करती थी हरियाली ,
मनुष्यों के कारण छा गयी है विपदा काली|

                                                                                अपनी सुन्दरता से मुझे क्या है करना ?
                                                             मनुष्यों के लिए हीं मैंने पहना था हरियाली का गहना |

                                  
                                   यह जानते हुए भी मनुष्य कर रहे पेड़ो की कटाई,
                                   अपनी बर्बादी को मनुष्यों ने खुद है बुलाई |

कहीं यह सपना बन ना जाए सच्चाई ,
इसीलिए प्लीज़ रोको पेड़ो की यह कटाई |

रविवार, 12 दिसंबर 2010

SAY NO 2 CASTEISM

प्रणाम!!! क्या हुआ ?शीर्षक अंग्रेजी में देख कर असमंजस में पड़ गए का ?आज आलोकिता का स्टाइल इतना बदला बदला क्यूँ है ?दरअसल बात ये है न कि कल मेरे ब्लॉग का एक महीना पूरा हो गया इसीलिए आज हम सोचे कि कुछ स्पेशल लिखा जाए | कुछ रियल लाइफ का बात भी बताया जाय |अब जो बात जैसे हुआ है उसी भाषा में बताने में अच लगेगा न इसीलिए हम ग्रामर शुद्धता इ  सब छोड़ के बस जैसे बोलते हैं रियल लाइफ में वैसे हीं लिख दे रहे हैं |
हम एक ठोबात सोच रहे थे कि हम लोग के पूरा समाज का कथनी और करनी में केतना फर्क है न | किताब में हम लोग को का पढाया जाता है ?यही न कि जात-पात नहीं मानना चाहिए लेकिन जो टीचर चाहे मम्मी पापा हमलोग को no castism   वाला चैप्टर पढ़ाते हैं वही लोग न फिर castism भी सिखाते हैं | का गलत कहें ? अईसे तो कहा जाता है कि जात धरम नहीं मानना चाहिए सबको मिलजुल कर रहना चाहिए | हम इ पूछते हैं कि जब जात पात कुछ होइबे नहीं करता है सब इंसान एके है तो हम लोग को जात धरम के नाम पर बाँट काहे दिया जाता है?
कोई फॉर्म भरने चलो तो कोस्चन जरुर रहता है Candidate appearing for the exam belongs to 1.General  2.O.B.C  3.Sc/St.
बचपन से सिखाया जाता है कि जात पात मत मानो लेकिन 8th 9th तक पहुँचते पहुँचते स्कूल में cast certificate माँगा जाने लगता है | 10th के लिए 9th registration होता है न |अब शिक्षित बनना है तो बिना अपना जात जाने हुए बच्चा शिक्षित कईसे हो सकता है ?
जब हम छोटे बच्चे थे न तो इस मामले में बहुत बेवकूफ थे (इ मत समझिएगा कि अब ढेर तेज़ हो गए हैं ) इसके लिए बहुत मजाक भी उड़ा है |कभी कोई दोस्त की मम्मी पुच देती की कौन जात हो बाबु मेरा तो मुँह बन जाता था | हँस के कह देते थे पता नहीं आंटी | अईसे देखती थी लगता था सोच रही है च्च्च बेचारी जात तक नहीं पता इसको |और फिर लगाती थी अपना जासूसी दिमाग 'अच्छा पापा का पूरा नाम क्या है '? धीरे धीरे जब बड़े होने लगे तो कोई कोई दोस्त लोग भी पूछने लगी | हमको इ सब से कुछ फर्क नै पड़ता था | लेकिन फर्क पड़ा जब teacher लोग भी पूछने लगे ? एकदम G.K.कोस्चन टाइप हो गया था ' कौन जात हो'?
संस्कृत में सबसे अच नंबर आया अचानक क्लास में श्लोक बोलवाए हम सब सही सही बोल दिए तो सर बहुत खुश हुए | शाबाशी देने के लिए बुलाये और पूछते हैं की श्लोक तो बहुत शुद्धता से बोली मिश्रा जी हो की झा जी (मेरे नाम में कोई सर नेम नहीं है न )वो खुद मिश्रा जी थे |हिंदी वाले झा सर लंच में बुला कर पूछते थे 'पापा सरकारी नौकरी में हैं न रे लालाजी हो क्या ?हम पूछे लालाजी को हीं सरकारी नौकरी मिलता है क्या सर ?बोले नहीं रे एदम पागले हो इधर लालाजी लोग जादे है नौकरी में न गेस कर रहे थे | लेकिन गजब पागल हो तुम १२ साल की लड़की इतना भी नहीं पता की कौन जात के हो |बहुत बुरा लगा था सर के बोलने का तरीका हमको | घर आते आते मम्मी से पूछे थे उस दिन की क्लिअर  क्लिअर  बताइए हमलोग किस कास्ट के हैं ?कौन सा कास्ट बड़ा होता है कौन सा छोटा सब बताइए | सर के कारण पूछ रहे हैं इ बात नहीं बताये मम्मी को काहे कि सर का बुराई करना हमको अच्छा नहीं लगता था | एक बार रविदास जयंती के दिन मेरी दो दोस्त (जुडुवा थी ) नहीं आई बोल के कि
कंही जाना है | गुप्ता सर G.K. वाले पूछे ये सीता गीता का जोड़ी कँहा गायब है ? जब हमलोग बोले कि कंही घुमने गयी है तो सर बोले आज तो रविदास जयंती है| जोशी टाइटिल से से हमको पते नहीं चला इ लोग के बारे में | इंग्लिश सर किसी से पूछते नहीं थे खली अपना बताते रहते थे कि हम श्रीवास्तव जी हैं | शिवपूजन सहाय रिश्ते में मेरे दादा लगते थे (कैसे कैसे वो हमको याद नहीं है )खैर क्लास ८ में मेरा कास्ट क्या है ?जबतक नहीं पता था तब तक तो ठीक था, अब पता चल गया और कोई कास्ट पर कमेन्ट करे तो बुरा तो लगता है न |मेरी एक दोस्त फॉरवर्ड कास्ट की थी क्लास में नीचे से फर्स्ट करती थी | बेचारी को पता नहीं था कि हम O.B.C.में आते हैं बोली पता है यार हमलोग को बहुत घाटा हो जाता है सब जो इ सब छोटा जात वाला सब होता है कम नंबर लाके भी आगे हो जाता है रेजेर्वेसन के चलते | हम लोग मेहनत कर करके मर जायेंगे तो भी पीछे हीं रह जायेंगे | चूँकि मन में इ बात आ चुका था कि हम O.B.C. हैं बुरा तो लगना निश्चित था न | हम बोले हाँ यार तेरे को तो बना बनाया बहाना मिल गया, छोड़ वो तो बहुत दूर की बात है क्लास में तो reservation नहीं है मेरे नंबर के आसपास आके दिखा दे | पर ये कटाक्ष उसके दिमाग से ऊपर था समझी नहीं | लड़ने का मूड नहीं था सो हम भी बात पलट दिए |
कहने के लिए तो जाती प्रथा ख़तम हो चुका है पर सच्चे दिल से सोचिये की का सही में ख़तम हुआ है ?कोई भी गुण-अवगुण आदमी का अपना होता है जाती से नहीं मिलता |
नेट में कंही भी साईन इन करने क लिए फर्स्ट नेम लास्ट नेम लिखना पड़ता है , हम तो लास्ट नेम कुछो रखे ही नहीं खाली आलोकिता |पर अपना नाम क साथ गुप्ता बोलने में अच्छा लगा तो लिख लिए लो रे भाई फिर कास्ट में बांध दिया गया | ३-४ गो फ्रेंड रिक्वेस्ट आया Hii! Alokita ji I'm a gupta 2 so add me....| अरे भाई मेरे इ मेरा फ्रेंड लिस्ट है गुप्ता कम्युनिटी थोड़े है |
आखिर कब तक मानवता के बीच में इ जातीयता का दीवाल खड़ा रहेगा ? कब तक ? जब तक हम सही तरीका से जातीयता से ऊपर नहीं उठेंगे धरम निरपेक्ष नहीं बन सकते और मानवता हा हा हा हा सोचना भी पागलपना है | है की नहीं ? है न |

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

दीपक और बाती

















पूछा था उसने
क्या होता है प्रीत ?
कैसा होता मनमीत ?
जवाब मिला
दिए बाती सी प्रीत कँहा ?
दीपक से बढ़ मनमीत कँहा ?
दिए बिन बाती का अस्तित्व मिट जायेगा |
बाती बिन,भला दीपक कँहा जायेगा ?
उस बाती को भी मिल गया एक दीपक ,
और दीपक की हो गयी वह बाती |
प्रेमाग्नि में जलने लगी बाती |
सबने देखा जल उठा है दीपक |
खुश थी वह दीपक की आगोश में जाकर |
चमक रही थी घृत प्रेम का पाकर |
प्रेम घृत का कतरा भी जब तक मिलता रहा ,
जलने का सिलसिला तब तक चलता रहा |
जल कर राख़ हो चुकी थी बाती ,
पर दीपक अब भी तो नवेला था |
मिट चुकी थी उस पर एक बाती ,
दूसरी के लिए वह फिर से अकेला था |
नयी बाती को ह्रदय में बसाया ,
फिर से प्रेम का ज्योत जलाया |
तेज़ हवा का एक झोंका आया ,
ज्योत प्रेम का टिक न पाया |
ह्रदयवासिनी अब भी थी बाती ,
घृत प्रेम का भरा पड़ा था |
जीवन में फिर भी अँधेरा था ,
बाती थी, दीपक फिर भी अकेला था |
दिए बाती में सच्चा प्रीत कँहा ?
हाँ इनमें सच्चा मनमीत कँहा ?