Saturday, March 23, 2013

तो क्या करें???






झूठी हो हाथों की हर लकीर तो क्या करें 
बेवफ़ा हो अपनी हीं तकदीर तो क्या करें 

मंजिलें भले मालुम हों रास्ते भी हों खुले 
अपने हीं पैरो में हो ज़ंजीर तो क्या करें 

ज़ख्म की गहराई हमने दिखा तो दी 
उन्हें मालूम नहीं दर्द की तासीर तो क्या करें 

हँसते रहने की आदत यूँ तो बना ली है 
कलम से उतर हीं आये दिल का पीर तो क्या करें 

...................................................................आलोकिता 

Thursday, October 25, 2012

कलयुग में अब तक रावण-दहन नहीं हुआ .........




लो दशहरा आया और चला भी गया। खूब पूजा-पाठ व्रत-उपवास किये गए, मौज-मस्ती भी खूब हुई और अंत में लंका दहन के नाम पर रावण के पुतले को जला कर पूरा समाज आत्म-संतुष्टि के भाव से भर गया। रावण-दहन केवल बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य, अनीति पर निति की विजय का प्रतीक नहीं बल्कि हमारे समाज के सकारात्मक सोच की पराकाष्ठा का भी ज्वलंत उदाहरण है। हर रोज़ नज़रों के सामने बुराई, असत्य, अनीति को जीतता हुआ देख कर भी हर साल सदियों पूर्व मिले एक जीत की ख़ुशी में हम जश्न मनाना नहीं भूलते इससे बेहतर सकारात्मक सोच का उदहारण क्या हो सकता है भला? 

 क्यूँ भूतकाल को पीछे छोड़ कर हम वर्तमान में नहीं आ पा रहे? आखिर कबतक हम पुतले को जला जला कर अपनी बहादुरी जताएंगे? क्यूँ नहीं समाज के असली रावणों को पहुंचा पा रहे हम उनके अंजाम तक? क्या इसलिए की हम सब बैठ कर फिर से उस राम के जन्म की प्रतीक्षा कर रहे हैं या फिर इसलिए की रावण की कमजोरी बता कर लंका दाहने वाले विभीषण अब जन्म नहीं ले रहे? 

राम के जन्म का तो पता नहीं लेकिन अगर विभीषण का इंतज़ार है तो वो अब कभी नहीं आने वाला क्यूंकि अब कोई भी रावण किसीको विभीषण बनने नहीं देता, उस रावण के पास कमसकम इतना आत्म-स्वाभिमान तो था कि अगर सीता से उसकी वासना पूर्ति होती तो वो उसकी साम्रागी होती पर आज का रावण 'साम्रागी' नहीं 'सामग्री' मानता है वो भी सार्वजनिक, जिसका भोग वो मिल बाँट कर कर सकता है तभी तो गैंग रेप की प्रथा सी चल पड़ी है और इसलिए अब कोई विभीषण भी रावण के खिलाफ खड़ा नहीं होता। इन विभीषण-प्रिय-रावणों से थोडा नज़र हटायें तो और भी ऐसे एक से एक दुराचार-विभूतियाँ मिलेंगी जिन्हें अगर मैं रावण की संज्ञा दूँ तो अपना अपमान समझ कर रावण भी मुझपर मानहानि का दावा ठोंक देगा। जी हाँ मैं वैसे ही पिताओं की बात कर रही हूँ जो अपनी ही मासूम बेटियों को नहीं बख्शते चाहे वो छः माह की हो तीन या फिर चौदह वर्ष की इन लोगों के लिए तो शायद अब तक कोई शब्द किसी भी भाषा में बना ही नहीं। 

जिस प्रकार त्रेता युग में रावण का वध करने के पूर्व उसके सारे सहायकों का वध करना पड़ा था ठीक उसी तरह समाज से रावणों का समूल नाश करने के लिए उन विकृत सोच वाले लोगों को भी उचित दण्ड मिलना ही चाहिए जो गाहे बगाहे मेघनाद सा गर्जन करते हुए न सिर्फ सारा दोष स्त्री जाती पर मढ़ देते हैं बल्कि रावण का वेष धरे कामी पुरुषों को संरक्षण के साथ-साथ ये तसल्ली भी दे देते हैं कि जब तक मैं हूँ तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जब तक रेप के कारणों को ढूंढने के नाम पर सारा दोष लड़कियों की पढाई, कभी उनके खुले विचार, कभी कपडे, कभी विवाह का उम्र, तो कभी बेबुनियादी तरीके से चाउमीन जैसी चीजों पर मढ़ने की छुट देते रहेंगे हम रावणों के पिछलग्गू मेघ्नादों को तबतक इनके पीछे छिप कर रावण अपनी कुकृत्यों को अंजाम देता रहेगा। हम सब बस परंपरा के नाम पर रावण का पुतला जलाएंगे और समाज में असली रावणों की संख्या बढती जायेगी, दहन होगा तो बस सीता और उसके परिजनों का। 












याद रखो ये त्रेता नहीं कलयुग है और कलयुग में अब तक रावण-दहन नहीं हुआ .........  














Monday, October 15, 2012

माता ऐसा वर दे मुझको . . . . . . . . .




माता ऐसा वर दे मुझको,  सारे सदगुण मैं पा जाऊं 
छोड़ सकूँ दुर्गुणों को सारे, दुर्बलता को भी तज़ पाऊं 

अडिग रहूँ कर्तव्यपथ पर, लाख डिगाय न डिग पाऊं 
अचल-अटल हो सकूँ शैल सी, हे शैलपुत्री ऐसा वर दो  

रह सकूँ संयमित सदैव, संकल्प की दृढ़ता मैं पाऊं
उत्कृष्ट हो हर आचरण, हे ब्रह्मचारिणी ऐसा वर दो  

स्वीकृत न हो अन्याय, न्याय की पक्षधर बन पाऊं
जगत कल्याणमयी हर सोच हो, चंद्रघंटा ऐसा वर दो 

सूर्य किरणों सा तेज़ दो माता, अंधकारों से लड़ पाऊं 
त्याग-प्रेम की ऊष्मा हो मुझमें, कुष्मांडा ऐसा वर दो 

ममत्व नारी का सहज गुण, पराकाष्ठा उसकी बन पाऊं 
अपने-पराये का भेद न हो, हे स्कंदमाता ऐसा वर दो  

भटक जाऊं न राह कभी, गुरुर मातपिता का बन पाऊं 
दिल से निभा सकूँ हर रिश्ता, कात्यायनी ऐसा वर दो  

मानवता कल्याण कर सकूँ,पापियों का काल बन पाऊं
हो शक्ति पाप के नाश की मुझमें, कालरात्रि ऐसा वर दो

कर्तव्यविमुढ़ता ना आये कभी, परिस्थिनुरूप ढल पाऊं
कर्तव्यपरायणता सदा हो मुझमें, महागौरी ऐसा वर दो

छूटे न अधुरा संकल्प कोई, पूर्णता हर कार्य को दे पाऊं 
खरी उतरूँ आशाओं की कसौटी पे, सिधिदात्री ऐसा वर दो  

सार्थकता दे सकूँ नाम को अपने, आलोकिता मैं बन पाऊं
आलोकित करूँ अँधेरी राहों को, हे माता वो तेज़ प्रबल दे दो 

    
     

Monday, September 10, 2012

हकीकत से आँखें मूंद के जीना नासमझी नहीं



ना पूछ जिन्दगी में तेरी जरुरत क्या है 
जो तू नहीं तो फिर जिन्दगी की जरुरत क्या है 

हकीकत से आँखें मूंद के जीना नासमझी नहीं 
गर टूट भी जाए तो सपनो से खुबसूरत क्या है 

इश्क में डुबके जिसने खुद को भुलाया नहीं
क्या जाने वो की लज्ज़त-ए-मोहब्बत क्या है 

ख्वाब था इश्क, इबादत भी तू हो गया है 
कह दे जिन्दगी में तेरी मेरी अहमियत क्या है 

ना चाह के भी हर बार तुझे हीं लिख बैठती हूँ 
पूछ हीं देते हैं सब बेदर्द की शक्ल-ओ-सूरत क्या है  

Thursday, August 2, 2012

बहन-रक्षा का प्रण लेने की जरुरत नहीं


अभी पिछले हीं दिन अखबार में छपी एक खबर में पढ़ा था बारहवीं की एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मुख्य नामजद अपराधी प्रशांत कुमार झा तीन बहनों का भाई है, उसकी बहन के बयान से शर्मिंदगी साफ़ झलक रही थी और छोटी बहन तो समझ भी नहीं पा रही उसके भाई ने किया क्या है | बस यही सोच रही थी की आज राखी के दिन क्या मनः  स्थिति होगी ऐसी बहन की जिसका भाई बलात्कार के जुर्म में जेल गया हो ...............

तेरे हिस्से की राखी आज जला दी मैंने 
इस बंधन से तुझको मुक्ति दिला दी मैंने 
अफ़सोस तेरी बहन होने के अभिशाप से छुट ना पाउंगी 
अपनी राखी की दुर्बलता पर जीवन भर पछ्ताउंगी 
मुझ पर उठी एक ऊँगली, एक फब्ती भी बर्दास्त ना थी 
सोचती हूँ कैसे उस लड़की का शील तुमने हरा होगा ?
वर्षों का मेरा स्नेह क्यूँ उस वक़्त तुम्हे रोक सका नहीं? 
क्यूँ एक बार भी उसकी तड़प में तुम्हे मेरा चेहरा दिखा नहीं?
इतनी दुर्बल थी मेरी राखी तुझको मर्यादा में बाँध ना सकी 
शर्मशार हूँ भाई, कभी तेरा असली चेहरा पहचान ना सकी
उधर घर पर माँ अपनी कोख  को कोस कोस कर हारी है
तेरे कारण हँसना भूल पिता हुए मौन व्रत धारी हैं 
सुन ! तेरी छुटकी का हुआ सबसे बुरा हाल है 
अनायास क्यूँ बदला सब, ये सोच सोच बेहाल है
छोटी है अभी 'बलात्कार' का अर्थ भी समझती नहीं 
हिम्मत नहीं मुझमे, उसे कुछ भी समझा सकती नहीं 
पर भाई मेरे, तु तो बड़ा बहादुर है, मर्द है तु 
उसको यहीं बुलवाती हूँ , तु खुद हीं उसको समझा दे 
बता दे उसे कैसे तुने अपनी मर्दानगी को प्रमाणित किया है 
और हाँ ये भी समझा देना प्यारी बहना को, वो भी एक लड़की है 
किसी की मर्दानगी साबित करने का वो भी जरिया बन सकती है 
अरे ये क्या, क्यूँ लज्जा से सर झुक गया, नसें क्यूँ फड़कने लगीं ?
यूँ दाँत पिसने , मुठ्ठियाँ  भींचने से क्या होगा ?
कब-कब, कहाँ-कहाँ, किस-किस से रक्षा कर पाओगे?
किसी भाई को बहन-रक्षा का प्रण लेने की जरुरत नहीं 
खुद की कुपथ से रक्षा कर ले बस इतना हीं काफी है 
जो मर्यादित होने का प्रण ले ले हर भाई खुद हीं 
किसी बहन को तब किसी रक्षक की जरुरत हीं क्या है?  

   

Tuesday, June 12, 2012

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है



















जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

शमा भी जलती चिता भी जलती 
जलती अगन दोनों में है 
औरों को रौशनी देने को शमा जलती,
कतरा-कतरा पिघलती है 
भष्म करके कई खुशियों अरमानो को हीं 
चिता कि लपटों को शान्ति मिलती है 
ज्योत शमा की चमक लाती नयनो में 
चिता की दाह अश्रुपूर्ण कर जाती है

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

उसी आग से जलता चूल्हा 
उसी से जलती भट्टी शराब की 
एक चूल्हे का जलना 
कई दिलों में ख़ुशी होठों पे हंसीं लाता है 
जलती जब एक शराब की भट्टी 
कितनो का घर लुट जाता है 
चूल्हे का जलना छुधा को तृप्ति पहुँचाता 
भट्टी स्वयं कितनी जिंदगियां, कितने रिश्तों को पी जाती है 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

जितनी पावन सात फेरों की अग्नि 
उतनी हीं पापिन दहेज़ की अग्नि 
जन्म-जन्मान्तर के रिश्ते में बांधती 
बनती सात वचनों की साक्षी फेरों की अग्नि 
रिश्ते हीं नहीं शर्मशार करती मानवता को भी 
बहुओं को जिन्दा जलाती दहेज़ की अग्नि 
इक गढ़ती नित नव रिश्ते
दूजी फूंकती प्रेम की डोरी 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

बीड़ी-सिगरेट के सिरे पर जलती छोटी लाल सी चिंगारी 
और जलती पूजा घर के धुप में भी 
दम घोंटता बीड़ी-सिगरेट का धुआँ 
मौत का दूत बन जाता है 
सुवासित करता धुप चहु दिशाओं को 
मानसिक सुकून भी पहुँचाता है 
इक कदम दर कदम मौत की तरफ ले जाता 
दूसरा आस्था का प्रतीक बन टिमटिमाता है 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है 

प्रेम की अग्नि जलती दिलों में 
विरहाग्नि दिलों को जलाती है 
मिलन भी उतपत करता जिस्मो-ओ-जिगर को 
विरह की ऊष्मा भी जलाती है 
हो इकतरफा भी लगी अगन तो
ताप दूजे तक भी जाती है 
जलना ये भी कहलाता है 
जलना वो भी तो होता है 

जलने और जलने में हीं कितना अंतर आ जाता है

.....................................................आलोकिता गुप्ता