Saturday, February 8, 2014

मेरे जीवनसाथी

मेरे जीवनसाथी, ओ प्राणप्रिय, चलो मिलकर प्रेम रचें
स्वामित्व-दासत्व की कथा नहीं, विशुद्ध प्रेम लिखें
न तुम प्राणों के स्वामी, न हीं मैं तेरे चरणों की दासी
तुम ह्रदय सम्राट मेरे, और मैं तुम्हारी ह्रदय-साम्रागी

तुम्हारी खामियों सहित पूर्ण रूप से तुम्हें अपनाऊं
तुम भी मुझे मेरी अपूर्णताओं के संग स्वीकारो
तुम्हारे स्वजनों को पुरे ह्रदय से मैं अपना बना लूँ
मेरे भी कुछ आत्मीय हैं, यह बात तुम भी न बिसारो

ओ हमसफ़र मेरे हर कदम पर हम-कदम बन जाओ
न बाँधो व्रतों के फंदों में मुझे या तो स्वयं भी बंध जाओ
साथ मिलकर चलो साझी खुशियों की माँगे दुआएँ
साह्चर्य्ता का रिश्ता है चलो हर कदम साथ बढायें


Saturday, February 1, 2014

फ़र्ज़ का अधिकार


इस पुरुष प्रधान समाज में
सदा सर्वोपरि रही
बेटों की चाह
उपेक्षा, ज़िल्लत, अपमान से
भरी रही
बेटियों की राह
सदियों से संघर्षरत रहीं
हम बेटियाँ
कई अधिकार सहर्ष तुम दे गए
कई कानून ने दिलवाए
बहुत हद तक मिल गया हमें
हमारी बराबरी का अधिकार
जन्म लेने का अधिकार
पढने का,
आगे बढ़ने का अधिकार
जीवन साथी चुनने का अधिकार
यहाँ तक कि
कानून ने दे दिया हमें
तुम्हारी संपत्ति में अधिकार
लेकिन .....
हमारे फर्जों का क्या?
आज भी बेटियाँ बस एक दायित्व हैं
आज भी हैं केवल पराया धन
हर फ़र्ज़ केवल ससुराल की खातिर
माँ-बाप के प्रति कुछ नहीं?
बुढ़ापे का सहारा केवल बेटे,
बेटियाँ क्यूँ नहीं?
क्यूँ बेटी के घर का
पानी भी स्वीकार नहीं?
क्यों बुढ़ापे का सहारा बनने का
बेटियों को अधिकार नहीं?
सामाजिक अधिकार मिल गए बहुत
आज अपनेपन का आशीर्वाद दो
कहती है जो बेटियों को परायी
उस परंपरा को बिसार दो
हो सके तो मुझको, मेरे
फ़र्ज़ का अधिकार दो
मुझको मेरे फ़र्ज़ का अधिकार दो

........................................अलोकिता(Alokita)

Monday, January 13, 2014

गुब्बारे वाला


दायीं हथेली में मम्मी और बायीं हथेली में पापा की ऊँगली थामे, अपने नन्हे-नन्हे कदमो से चलती हुई सर्जना क्लास रूम तक पहुँची| शिक्षिका ने उसे अपने सामने देखते हीं गुस्से में कहा ‘फेल हुई हो तुम, दुबारा पढ़ना इसी क्लास में’ और कुछ बच्चे हँस पड़े| शिक्षिका का वह वाक्य और अपने सहपाठियों की हँसी उसके कोमल ह्रदय पर कठोर प्रहार से थे| अपने चारों ओर उसे खुद के लिए केवल तिरस्कार और उपेक्षा हीं नज़र आ रही थी, वह सहम गयी| वह चाहती थी कि पापा उसे गोद में उठा लें या मम्मी अपने आँचल में छुपा ले| वह सुरक्षित महसूस करना चाहती थी| उसने आशा भरी दृष्टी से अपने पिता को देखा, उन्होंने गुस्से में नज़रें फेर लीं, माँ के आँचल में लिपट जाना चाहा तो उन्होंने उसके कोमल से गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया| दोनों हीं आज सर्जना की वजह से शर्मिंदा थे, उनके सहकर्मियों के बच्चे अच्छे नंबरों से पास हुए थे और उनकी बेटी ने फेल होकर उनका सर शर्म से झुका दिया था (टिउसन में खर्च किये पैसे भी तो बर्बाद हुए)| उसकी हथेली से माँ-बाप की उँगलियाँ फिसल गयीं या उन्होंने खुद हाथ छुड़ा लिया उसे नहीं मालुम, पर क्या फर्क पड़ता है...| ठीक उसी तरह जैसे किसी को क्या फर्क पड़ता है कि सर्जना ने पास होने के लिए पूरी मेहनत की थी, क्या फर्क पड़ता है कि उसे भी फेल होना पसंद नहीं वह भी अपने सहपाठियों की तरह नयी कक्षा में जाना चाहती थी.......दुनिया परिणाम देखती है| परिणाम यह था कि सर्जना फेल हुई थी और वापस लौटते वक्त मम्मी-पापा के साथ तो थी पर उनकी उँगलियों का सहारा न था| वह अकेली हीं लौट रही थी....

घर पहुँचते हीं उसे उसकी सजा सुना दी गयी| उसके कमरे में उसे अकेले बंद कर दिया गया क्यूंकि उसे अकेले रहना पसंद नहीं था और नाहीं बंद कमरे में (अक्सर अपने लोग जानते हैं चोट कहाँ दी जाए)| कमरे में अकेले बैठी वह रोती रही, वह जानती थी कि उसने पूरी मेहनत की थी लेकिन याद किया हुआ वह कुछ भी तो याद नहीं रख पाती| वह दुखी थी, आत्मग्लानी से भरी हुई, उसके माता-पिता दुखी थे, गुस्से से भरे हुए, सबकी नज़रों में गुनहगार सिर्फ ‘सर्जना’ थी| उस छोटे से कमरे में बंद उस छोटी सी लड़की को क्या मालुम था कि बाहर बड़े-बड़े सम्मेलनों, अखबारों, व्याख्यानों में बड़े-बड़े लोग अक्सर ‘हर बच्चा खास है’ जैसी पंक्तियाँ बोल कर कितनी तालियाँ, कितनी वाह-वाहियाँ बटोर ले जाते हैं| उसे तो बस इतना पता था कि वह खास नहीं है और वह खास हो भी नहीं सकती| वह तो केवल साधारण से अंक लेकर पास होने वाले सभी आम बच्चों की तरह आम होना चाहती थी पर वह तो आम भी नहीं थी|

घंटो रोती-रोती सर्जना चुप हुई और उसी वक्त उसकी माँ उसके लिए खाना लेकर आई और उसे चुपचाप बैठा देख कर बोली ‘कुछ शर्म बाकी है तो अब भी तो पढ़ ले’ और उसके सामने खाना रख कर चली गयी| आत्मग्लानी और बेबसी से वह फिर सिसकने लगी| माँ ने तो अपनी खीझ उसपर निकाल ली (और शायद पापा ने माँ पर) लेकिन वह किसको कुछ कह सकती थी...

कुछ देर बाद कमरे में फिर सन्नाटा पसर गया और बाहर सड़कों पर हलचल बढ़ गयी| खिडकी बंद थी, शायद शाम ढलने को थी क्यूंकि शाम को हीं तो इतनी चहल पहल और शोर बढ़ जाता है...हर रोज़| टन-टन टन-टन घंटी बजाता हुआ कोई गुज़रा, वह पहचानती थी उस आवाज़ को समझ गयी ‘हवा मिठाई’ बेचने वाला था| ‘मुन्नी बदनाम हुई’ गाना बजाता हुआ ‘कुल्फी’ वाला गुज़रा, फिर थोड़ी देर बाद ढब-ढब की आवाज़ करता आइस-क्रीम वाला, गोल्डेन होगा या फिर रौलिक वाला भी हो सकता है| हर बच्चे की तरह उसका मन भी इन चीजों के लिए ललचाता था लेकिन वह मूर्तिवत बैठी रही| थोड़ी देर बाद एक और आवाज़ आई जिसे वह पहचान नहीं पायी| हर क्षण वह आवाज़ पास आ रही थी फिर शायद वह जो भी था उसकी खिडकी के पास हीं ठहर गया| मन में उत्सुकता तो थी लेकिन वह कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहती थी जिससे मम्मी-पापा को और बुरा लगे इसलिए उसने खिडकी खोल कर बाहर नहीं देखा| कुछ देर बाद वह आवाज़ फिर दूर जाने लगी और धीरे-धीरे खत्म हो गयी|


अगले दिन से उसे ज्यादा से ज्यादा देर तक पढ़ने की हिदायत मिली और शाम को खेलना बंद कर दिया गया| वह पढ़ रही थी, काफी देर से पढ़ रही थी यहाँ तक शाम को जब सभी बच्चे खेल रहे थे वह तब भी किताब के साथ हीं बैठी थी| बाहर सबकुछ रोज़ जैसा हीं था, उसके होने या न होने से बाहर की दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ा था| अचानक फिर वही जादुई सी आवाज़ जो कल उसने पहली बार सुनी थी, फिर कहीं दूर से पास आ रही थी| आज वह खुद को रोक नहीं पायी, पलंग के सिरहाने के पास वाली खिडकी पर चढ़ कर इधर-उधर देखने लगी(मम्मी तो ऐसे भी टी. वि देखने में व्यस्त थी अपने कमरे में)| आज उसे मालुम हुआ वह तो एक गुब्बारे वाला था जो कुछ बजाता हुआ आ रहा था, वह ‘कुछ’ क्या था उसका नाम तो सर्जना को भी नहीं मालुम पर शायद कहीं ऐसी तस्वीर देखि थी उसने| वह गुब्बारे वाला, गुब्बारे बेचता हुआ आकर उसकी खिडकी के बाहर पड़े पत्थरों के ढेर पर बैठ गया, शायद थक गया था आराम करना चाहता था| लेकिन छिः उन्ही पत्थरों के ढेर पर तो रात को कुत्ते सोते हैं और एक दिन तो सर्जना की चप्पल में वहीं खेलते वक्त डॉगी की पौटी लग गयी थी| अचानक उसने बोला ‘गुब्बारे वाले वहाँ मत बैठो, वहाँ तो डॉगी सोता है’(पौटी करता है बोलने वाली थी पर कुछ सोच कर चुप रह गयी)| उसकी तरफ प्यार से देखते हुए गुब्बारे वाला हँस कर बोला बड़ी प्यारी बच्ची है और वहीं बैठ गया| खैर वह कहीं बैठे गुब्बारे तो उसके पास बहुत तरह-तरह के थे, इतने रंग-बिरंगे कि शायद टीचर को भी इन रंगों के नाम मालुम न हो (यह ख्याल मन में आते हीं उसके होठों पर एक मासूम हँसी तैर गयी)| वह देख रही थी कुछ बच्चे आ-आ कर गुब्बारे वाले से अपनी-अपनी पसंद के गुब्बारे खरीद रहे थे| उसने सोचा अगर मम्मी उसे गुब्बारे खरीद दे तो वह कौन सा लेगी? उसे तो सभी पसंद हैं| थोड़ी देर बाद जब गुब्बारे वाला उठ कर जाने लगा तो सर्जना ने हाथ बढ़ा कर गुब्बारे छूने की कोशिश की और वह कामयाब रही| उसकी नन्ही हथेलियों को सहलाते हुए एक गुब्बारा गुज़रा......बिलकुल आसमान के रंग का...उसकी ड्राविंग बुक के आसमान के रंग का|


उस दिन से तो रोज़ का नियम हो गया....गुब्बारे वाले का इंतज़ार...| वह आता भी रोज़ था और वहीं बैठता था, सर्जना को देख कर मुस्कुराता और रोज़ उसे एक गुब्बारा देता, जिसे वह कभी भी खिडकी की सलाखों के बीच से अंदर नहीं ला पाती थी बस थोड़ी देर हाथ में ले कर लौटा देने में ही उसे अपार खुशी होती थी| गुब्बारा लेने या उससे खेलने से ज्यादा बड़ी खुशी इस बात की थी कि उसके सिवा गुब्बारे वाला किसी और बच्चे को बिना पैसे लिए गुब्बारे छूने भी नहीं देता था| एक दिन कारण पूछने पर उसने कहा था कि वह उसे उन सारे बच्चों से ज्यादा अच्छी लगती है, सबसे अलग| सर्जना को भी तो वह गुब्बारे वाला बहुत अच्छा लगता था, यूँही नहीं वह अपनी हर कॉपी के पीछे गुब्बारे वाले की चित्र बनाती रहती थी| सर्जना की  खुशी और गुब्बारे वाले के खास होने का कारण वो गुब्बारे नहीं बल्कि वह एहसास था जो उसे उस गुब्बारे वाले ने उसे दिया था.....’खास होने का एहसास’                   

Thursday, January 9, 2014

बेगैरत सा यह समाज . . . . .

हर रोज यहाँ संस्कारों को ताक पर रख कर
बलात् हीं इंसानियत की हदों को तोड़ा जाता है

नारी-शरीर को बनाकर कामुकता का खिलौना
स्त्री-अस्मिता को यहाँ हर रोज़ हीं रौंदा जाता है

कर अनदेखा विकृत-पुरुष-मानसिकता को यह समाज
लड़कियों के तंग लिबास में कारण ढूंढता नज़र आता है

मानवाधिकार के तहत नाबालिग बलात्कारी को मासूम बता
हर इलज़ाम सीने की उभार और छोटी स्कर्ट पर लगाया जाता है

दादा के हाथों जहाँ रौंदी जाती है छः मास की कोमल पोती
तीन वर्ष की नादान बेटी को बाप वासना का शिकार बनाता है

सामूहिक बलात्कार से जहाँ पाँच साल की बच्ची है गुजरती
अविकसित से उसके यौनांगों को बेदर्दी से चीर दिया जाता है

शर्म-लिहाज और परदे की नसीहत मिलती है बहन-बेटियों को
और माँ-बहन-बेटी की योनियों को गाली का लक्ष्य बनाया जाता है

स्वयं मर्यादा की लकीरों से अनजान, लक्ष्मण रेखा खींचता जाता है
बेगैरत सा यह समाज हम लड़कियों को हीं हमारी हदें बताता है


Ø  आलोकिता (Alokita)

Monday, December 30, 2013

जी करता है . . .

तेरे प्यार पर जां निशार करने को जी करता है
तेरी हर बात पर ऐतबार करने को जी करता है

बेपनाह हों दूरियाँ , भले तेरे-मेरे दरमियाँ
क़यामत तक तेरा इंतज़ार करने को जी करता है

हाथों में हाथ हो, तू मेरे अगर जो साथ हो
दुनिया के हर डर से इनकार करने को जी करता है

तेरे दामन की खुशियाँ भले हमें मिले न मिले
तेरा हर अश्क़ खुद स्वीकार करने को जी करता है 

खामोश हो जाते हैं लब तेरे सामने जाने क्यूँ 
हर रोज़ मगर प्यार का इज़हार करने को जी करता है 


Saturday, December 14, 2013

अच्छा लगता है


ख़ामोश तन्हाइयों से निकल, किसी भीड़ में खो जाना
अच्छा लगता है कभी-कभी भीड़ का हिस्सा हो जाना

भूल कर अपने आज को, बीती गलियों में मंडराना
अच्छा लगता है कभी-कभी पुरानी यादों में खो जाना

शब्दों में बयां किए बगैर, दिल के एहसासों को जताना
अच्छा लगता है कभी-कभी मुस्कुरा के खामोश हो जाना

बेमतलब बेईरादतन बार-बार यूँ हीं मुस्कुराना
अच्छा लगता है कभी-कभी अंजाने ख्यालों में खो जाना

दुनिया के कायदों, अपने उसूलों को तार-तार करना
अच्छा लगता है कभी-कभी बन्धनों से आज़ाद हो जाना


                                                      






........आलोकिता 

Saturday, December 7, 2013

तुम . . .


बेधड़क गूँजता अट्टहास नहीं
हया से बंधी अधरों की अधूरी मुस्कान हो तुम

जिस्म की बेशर्म नुमाइश नहीं
घूँघट की आड़ से झांकते चेहरे की कशिश हो तुम

उठी हुयी पलकों का सादापन नहीं
झुकी झुकी सी पलकों का स्नेहिल आकर्षण हो तुम

भूली-बिसरी कोई गीत नहीं
हर वक्त ज़ेहन में मचलती अधूरी कविता हो तुम

साधारण सी कोई बात नहीं
इक अलग सा कुछ खास हीं एहसास हो तुम


लब पे आ सके वो नाम नहीं

दिल के कोने में बसा अंजाना जज़्बात हो तुम



                                         






...आलोकिता