सोमवार, 17 जुलाई 2017

ये कैसा संस्कार जो प्यार से तार-तार हो जाता है?



जात-पात न धर्म देखा, बस देखा इंसान औ कर बैठी प्यार

छुप के आँहे भर न सकी, खुले आम कर लिया स्वीकार


हाय! कितना जघन्य अपराध! माँ-बाप पर हुआ वज्रपात

नाम डुबो दिया, कुलच्छिनी ने भुला दिए सारे संस्कार

कुल कलंकिनी, कुल घातिनी क्या-क्या न उसे कह दिया

फिर भी झुकी न मोहब्बत तो खुद क़त्ल उसका कर दिया



खुद को देश के नियम-कानूनों से भी बड़ा समझने वालों

प्रतिष्ठा की खातिर, बेटियों की निर्मम हत्या करने वालों

इज्ज़त और संस्कार की भाषा सिखा देना फिर कभी

पहले तुम स्वयं को इंसानियत का पाठ तो पढ़ा लो


हाय! ये कैसा संस्कार जो प्यार से तार-तार हो जाता है?

कैसी ये प्रतिष्ठा जिसमें हत्या से चार चाँद लग जाता है?

11 टिप्‍पणियां:

  1. प्रश्न उठाती एक मार्मिक व्यथा

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  2. संवेदनाओं से भरी मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ बहुत दिनो के बाद आपको लिखते देखकर खुशी हुई।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (19-07-2017) को "ब्लॉगरों की खबरें" (चर्चा अंक 2671) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. kya me ise apne page pe post kr sakti hu with your name and your blog
    https://www.facebook.com/MissKalpanablog/

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