Thursday, May 3, 2012

क्या यही प्रेम परिभाषा है ?


तुझसे लिपट  के........... तुझी में सिमट जाऊं 
भुला  के खुद को.......... तुझपे हीं मिट जाऊं 
ये कैसी तेरी चाहत ? ये कैसा है प्यार सखे ?
मिट जाए पहचान भी नहीं मुझे स्वीकार सखे 

है प्यार मुझे भी, प्रीत की हर रीत निभाउँगी
तुझसे जुडा हर रिश्ता सहर्ष हीं अपनाउंगी
पर  भुला दूँ अपने रिश्तों को मुझसे ना होगा 
एक तेरे लिए बिसरा दूँ सब मुझसे ना होगा 

बेड़ियों सा जकड़ता जा रहा हर पल मुझको 
ये कैसा प्यार जो तोड़ रहा पल पल मुझको ?
खो दूँ अपना अस्तित्व ये कैसी प्रीत कि आशा है ?
पाके तुझको खुद को खो दूँ यही प्रेम परिभाषा है ?

                                                    .......................आलोकिता 

10 comments:

  1. हाँ...बेशक यही हैं ....

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  2. पाके तुझको खुद को खो दूँ यही प्रेम परिभाषा है ?.....ekdam nahin......

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  3. बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनायें ....

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  4. बहुत ही सुलझे विचार आपकी संवेदनाओं में दिखायी दिये....

    आपकी यह रचना पसंद आयी.

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
    चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
    टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
    मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
    उद्गारों के साथ में, अंकित करना भाव।।

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  6. है प्यार मुझे भी, प्रीत की हर रीत निभाउँगी
    तुझसे जुडा हर रिश्ता सहर्ष हीं अपनाउंगी
    पर भुला दूँ अपने रिश्तों को मुझसे ना होगा
    एक तेरे लिए बिसरा दूँ सब मुझसे ना होगा ..

    सच है और भी बहुत कुछ है जमाने में निभाने के लिए ... प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए ..

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