तुझसे लिपट के........... तुझी में सिमट जाऊं
भुला के खुद को.......... तुझपे हीं मिट जाऊं
ये कैसी तेरी चाहत ? ये कैसा है प्यार सखे ?
मिट जाए पहचान भी नहीं मुझे स्वीकार सखे
है प्यार मुझे भी, प्रीत की हर रीत निभाउँगी
तुझसे जुडा हर रिश्ता सहर्ष हीं अपनाउंगी
पर भुला दूँ अपने रिश्तों को मुझसे ना होगा
एक तेरे लिए बिसरा दूँ सब मुझसे ना होगा
बेड़ियों सा जकड़ता जा रहा हर पल मुझको
ये कैसा प्यार जो तोड़ रहा पल पल मुझको ?
खो दूँ अपना अस्तित्व ये कैसी प्रीत कि आशा है ?
पाके तुझको खुद को खो दूँ यही प्रेम परिभाषा है ?
.......................आलोकिता
हाँ...बेशक यही हैं ....
ReplyDeleteपाके तुझको खुद को खो दूँ यही प्रेम परिभाषा है ?.....ekdam nahin......
ReplyDeleteG
ReplyDeleteबहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनायें ....
ReplyDeletesundar bhavon ki abhivyakti .aabhar
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बहुत ही सुलझे विचार आपकी संवेदनाओं में दिखायी दिये....
ReplyDeleteआपकी यह रचना पसंद आयी.
सुंदर प्रस्तुति
ReplyDeleteबहुत बढ़िया प्रस्तुति!
ReplyDeleteआपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
उद्गारों के साथ में, अंकित करना भाव।।
है प्यार मुझे भी, प्रीत की हर रीत निभाउँगी
ReplyDeleteतुझसे जुडा हर रिश्ता सहर्ष हीं अपनाउंगी
पर भुला दूँ अपने रिश्तों को मुझसे ना होगा
एक तेरे लिए बिसरा दूँ सब मुझसे ना होगा ..
सच है और भी बहुत कुछ है जमाने में निभाने के लिए ... प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए ..
sunar prastuti
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