Wednesday, November 9, 2011

चाँद न आता


चाँद न आता जो अँधेरी रात न होती 


जिन्दगी में हमारी फिर वो बात न होती 

यूँ तो तब भी भटकता चाँद गगन में 

पर नज़रों से उसकी मुलाक़ात न होती 

उजाला हीं उजाला रहता जो जीवन में 

मय्यसर हमें तारों की बारात न होती 

लील न जाता यदि अँधियारा सूर्य को 

तो जगमगाते जुगनुओं की ज़ात न होती 

खोये न होते जो अँधेरे सन्नाटों में कभी

अपने हीं दिल से हमारी बात न होती 

चाँद न आता जो अँधेरी रात न होती 

जिन्दगी में हमारी फिर वो बात न होती 

18 comments:

  1. jitni sunder tum ho utni hi sunder tumhari rachna hai

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  2. बहुत दिनों के बाद ... बहुत ही बेहतरीन.....अच्छा लगा वापसी देखकर...शुभकामनाएं....!

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  3. अँधेरा सूरत को लीलता है तभी जुगनू का एहसास होता है ... अर्थपूर्ण रचना ... सुन्दर प्रस्तुति ...

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  4. तुमसे यूँ मुलाकात न होती .... है न ?

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  5. Fabulous.. and sooo inspiring.. :):)

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  6. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-694:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  7. यकीनन अपने दिल से बात करनी है तो सन्नाटा चाहिये ही
    बहुत खूबसूरत रचना

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  8. वाह! अच्छी रचना!

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  9. बहुत अच्छी रचना

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  10. वाह बहुत ही सुन्दर रचना...
    सादर बधाई...

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  11. सुंदर रचना..बहुत ही भावपूर्ण।

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  12. bahut sundar rachna likhi hai mam...
    jai hind jai bharat

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  13. बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति.हार्दिक बधाई और शुभकामनायें!
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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