Saturday, February 5, 2011

वर्षा



जाने किस पनघट से 

भर अमृत कलश 
चली जा रही थी 
किसने मारा कंकड़ ?
फूटे मेघ घट 
बही रसधार 
धरा पी पी सुधा 
तृप्त हुई जाती है 
भीगने को व्याकुल 
सकल नर नारी 
नन्हों की खिल उठी 
किलकारी 
नदियाँ बाँहें फैलाये 
मांग रही दो बूंद 
पाकर सुधांश 
दे आई सागर को 
आई जो सूर्यकिरण 
उपहार मिले कुछ 
जल  कण
फिर से भर आई वह 
पनघट 
फिर से भर गए 
मेघों के जल घट
 

15 comments:

  1. वाह....
    लेकिन अभी इस मौसम में ये बरसात कैसी...???

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  2. .

    भावों की आनंद वर्षा की आपने.
    बेहद सुन्दर शब्द चयन.
    बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति.

    .

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  3. Bhut khubsurat,varsha ka bhut hi sundar varnan...kya baat hai aaj aap charcha manch par nhi aayi..aaye aur humara margdarshan kare..aapka abhar

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  4. बहुत सुन्दर ...बेजोड कल्पना.

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  5. बेहद सुन्दर भावों की आनंद वर्षा की आपने| सुन्दर अभिव्यक्ति|

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  6. वर्षा का सुन्दर चित्रण किया है आपने अपनी इस रचना में!

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  7. आपके इस लेख पर ७ सुन्दर (सुन्दर कमेन्ट) प्राप्त हुए है आप बताइए आपको कौनसा वाला सुन्दर पसंद है..
    बस उसी सुन्दर की फोटो कॉपी हमारी और से भी स्वीकार करे..

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  8. बेशक बहुत सुन्दर लिखा और सचित्र रचना ने उसको और खूबसूरत बना दिया है.

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  9. कुछ दिनों से बाहर होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका
    माफ़ी चाहता हूँ

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  10. अब "सुन्दर" कमेन्ट बढ़कर 9 हो गए है ..

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  11. यही एक सार्थक जिन्दगी है, सुन्दर चित्रण. साधुवाद।

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  12. sabdo se baarish ka pyara sa khaka khinch diya..:)

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  13. Thanks aap sabhi ka protsahan ke liye aur baraskar sir mujhe to sare sundar hi ati sundar lage sachchi

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