Saturday, March 23, 2013

तो क्या करें???






झूठी हो हाथों की हर लकीर तो क्या करें 
बेवफ़ा हो अपनी हीं तकदीर तो क्या करें 

मंजिलें भले मालुम हों रास्ते भी हों खुले 
अपने हीं पैरो में हो ज़ंजीर तो क्या करें 

ज़ख्म की गहराई हमने दिखा तो दी 
उन्हें मालूम नहीं दर्द की तासीर तो क्या करें 

हँसते रहने की आदत यूँ तो बना ली है 
कलम से उतर हीं आये दिल का पीर तो क्या करें 

...................................................................आलोकिता 

8 comments:

  1. बहुत ही सार्थक प्रस्तुतीकरण,आभार.

    ReplyDelete
  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-03-2013) के चर्चा मंच 1193 पर भी होगी. सूचनार्थ

    ReplyDelete
  3. बहुत गहरे खयालात ...बहुत उम्दा

    ReplyDelete
  4. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  5. jao shishe ka badan lekar kidhar jaoge

    log patthar kahen chhu lenge bikhar jaoge

    main to khushbu hoon...fizao me utar jaunga,
    mujhse ruthoge jo mere phool to marjaogen

    ReplyDelete
  6. Rat chahe kitni bhee gahari kyon na ho....
    Suraj ko hamesa ke liye nahi dhak sakta

    ReplyDelete