Sunday, December 19, 2010

पिंजरबद्ध जिंदगानी

पिजड़े में बंद एक तोता हूँ मैं ,
हार वक़्त भाग्य पर रोता हूँ मैं |

पर होते हुए भी अपर रहना मेरी मज़बूरी,
मीठू-मीठू की रट लगाना भी जरुरी |

ये घर वाले जताते हैं मुझसे कितना प्यार ,
क्या इतना भयंकर और क्रूर होता है प्यार?

एक दिन मन में एक ख्याल आया ,
मैंने मुन्नी को बहुत बहलाया |

बोला, खोल दो यह पिंजड़ा अगर,
दो मिनट उड़ कर आ जाऊंगा अन्दर |

पर वह भी थी बड़ी सायानी ,
उसने मेरी एक न मानी|

बोली खोल दूँ पिंजड़ा तो उड़ जाओगे ,
वापस ना फिर यहाँ  तुम आओगे |

तुरंत एक ताला पिंजड़े में जड़ दिया ,
उड़ान को सपनो से भी दूर कर दिया |

शायद हर पिंजरबद्ध की है यही कहानी ,
हाय ! यह पिंजरबद्ध जिंदगानी |
    

12 comments:

  1. बेशक बहुत सुन्दर लिखा और सचित्र रचना ने उसको और खूबसूरत बना दिया है.

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  2. आलोकिता जी
    "ला-जवाब" जबर्दस्त!!
    .............प्रशंसनीय रचना।

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  3. bilkul sachai likhi hai.....tota sach hi bolta hai..

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  4. bahut hi badiya likha hai aapne..
    aaj kal ki bhaaga bhaagi wali zindgai bhi kuch aisi hi hai, kehne ke liye bas insaan aazaad hai..

    mere blog par bhi kabhi aaiye
    Lyrics Mantra

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  5. U have superbly expressed the pain of confinement. Gooooooooooood.

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  6. सुन्दर अभिव्यक्ति !
    शुभकामनाएं!
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  7. रचना मैं एक निर्दोष भाव हैं पर रचना का सार ग्राह्य नहीं हो पाता
    हम नियति को नहीं बदल सकते पर उसके एहसास को जरूर बदल सकते हैं
    आपकी भावनाए हैं पर रचना परिमल की भांति पूरे गुलिस्तान को महकाती हैं

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