Monday, September 19, 2016

हरिजन बनाम दिव्यांग-जन: प्रधानमंत्री के नाम एक खुला ख़त


परम आदरणीय
श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी
देश के वर्तमान प्रधानमन्त्री (स्वकथित प्रधान सेवक)

महाशय,
कहना चाहूँगी कि एक राजनीतिज्ञ के रूप में यह अति प्रशंसनीय है कि पार्टी से ऊपर उठ कर आपने देश के महान राजनेता को तवज्जो दिया और स्वच्छ भारत अभियान को गाँधी जी के सपने के रूप में प्रचारित करके आगे बढ़ाया। किसी महान व्यक्ति के पदचिन्हों पर चलना अच्छी बात है पर ये जरुरी तो नहीं कि उसकी की हुई गलती को भी हम दोहराएँ?

हमारे देश के महान राजनीतिज्ञ श्री मोहनदास करमचन्द गाँधी ने दलितों के उत्थान के नाम पर उन्हें ‘हरिजन’ बना दिया, ठीक उसी प्रकार आपके मन में बात आई और आपने विकलांगों को ‘दिव्यांग-जन’ की उपाधि दे डाली। वैसे मैं आप दोनों में से किसी भी राजनीतिज्ञ की मंशा पर संदेह नहीं कर रही (हो सकता है उनसे गलती हुई और आपने सिर्फ उसे दोहराया)  परन्तु कहीं न कहीं तो आप दोनों हीं असल मुद्दे से भटके हैं। गाँधीजी तो बीता कल हो चुकें हैं और कागज़ी तौर पर हरिजन शब्द के प्रयोग पर रोक भी लग चूका है परन्तु आप हमारे वर्तमान प्रधानमन्त्री हैं इसलिए आपसे अनुरोध है कि असल मुद्दे को छोड़ कर न खुद भटकें और न हमें गुमराह करने की कोशिश करें।

हरिजन और दिव्यांग-जन ये दोनों ही नाम भ्रमित करने वाले हैं। गाँधीजी ने मुख्यधारा से काटे गए तथाकथित नीची जाति के लोगों को नाम दिया ‘हरिजन’ मतलब हरी/भगवान का जन। क्या सिर्फ नीची जाति के लोग भगवान के जन होते हैं? यह तो आप भी समझते होंगे की यह नाम सिर्फ उन दलितों को सांत्वना के रूप में दिया गया था कि तुम(भी) ईश्वर की संतान हो। असल मायेने में समाज के अन्दर हरिजन भी उतना ही अपमानजनक शब्द है जितना अछूत या अश्पृश्य और इसीलिए हरिजन शब्द के प्रयोग पर सरकारी तौर पर रोक भी लगानी पड़ी। जब उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का वक़्त था उसी वक़्त हरिजन नाम से ऐसी राजनीति हुई कि मुख्यधारा में आकर भी हरिजन समाज का एक अलग-थलग पड़ा हुआ अंग है।  शाब्दिक अर्थ देखें तो हरिजन के अर्थ में अपमानजनक कुछ भी नहीं बल्कि ये तो सम्मानसूचक शब्द है (और गाँधी जी ने यही समझाया भी था)। पर समाज में रहते हुए यह समझ में आता है कि हरिजन ठीक उसी प्रकार अपमानजनक है जिस प्रकार ‘माँ की आँख’ जैसी गालियाँ, जिनके शाब्दिक अर्थ में कुछ भी बुरा नहीं पर फिर भी इनमें क्या बुरा है ये तो सबलोग जानते हैं। आपका सुझाया हुआ शब्द ‘दिव्यांग-जन’ अपमानजनक न हो फिर भी हरिजन की तरह ही भ्रमित करने के साथ-साथ मुख्यधारा से हमेशा के लिए काट के एक अलग श्रेणी में बाँटने वाला शब्द है। दिव्यांग का अर्थ है जिसके अंग(अंगों) में दिव्य शक्ति हो। इस शब्द के प्रयोग के लिए आपने व्याख्या भी दी है कि किसी एक अंग के काम न करने की स्थिति में उसकी क्षतिपूर्ति के लिए प्रायः विकलांग व्यक्ति का कोई दूसरा अंग ज्यादा सक्रीय (दिव्य शक्तियों से युक्त) हो जाता है इसलिए उस अंग को ध्यान में रख कर उन्हें दिव्यांग कहा जाना चाहिए। मैं यहाँ आपसे कहना चाहूँगी कि भगवान हमें किसी ‘स्पेशल पैकेज’ के अंतर्गत ऐसी किसी दिव्य शक्ति का वरदान देकर नहीं भेजते। हम विकलांगजन अपने-अपने शरीर की कमियों के साथ जीने और समाज के मापदंडो पर खरे उतरने के लिए हर दिन संघर्ष करते हैं। कृपया हमारे संघर्ष, हमारी मेहनत का श्रेय किसी दिव्य शक्ति (जो हमें मिली नहीं है) को न दें। विकलांग होना कोई दिव्य अनुभव नहीं होता। दिव्य इंसान बता कर हमारे कष्टों को महिमामंडित करने के बजाये हमारे संघर्षों को कम करने पर ध्यान दें तो ये न सिर्फ हमारे लिए बल्कि पूरे देश के लिए श्रेयष्कर होगा। आपको यह समझना चाहिए कि शरीर की कमी से ज्यादा आधारभूत संरचनाओं की कमी व्यक्ति को विकलांग बनाती है। अगर मैं किसी सार्वजानिक कार्यालय में जाऊं और वहाँ केवल सीढ़ियाँ हो तो मैं विकलांग हूँ क्यूंकि दूसरों की मदद के बगैर मैं वहाँ अपना काम नहीं कर पाऊँगी। वहीँ दूसरी तरफ़ अगर उस सार्वजानिक कार्यालय में रैंप भी बने हो, तो मैं विकलांग नहीं हूँ क्यूँकी सामान्य लोगों की तरह ही मैं भी अपना काम खुद कर पाऊँगी।  

वैसे हमें ‘दिव्य’ मानव बनाने का विचार आपके दिमाग में आया कैसे? मेरे मन में एक शंका है...बुरा न मानें तो पूछूँ? अक्सर देखा है, ख़ास करके गांवों में, कुछ लोग विकलांगता को पूर्व जन्म के पाप का फल मानते हैं और विकलांगों से दूरी बना कर रखना चाहते हैं। वहीँ दूसरी ओर बहुत से लोग (खुद को ज्यादा समझदार और संवेदनशील मानने वाले) हम विकलांगों को ईश्वर का भेजा ख़ास दूत मानते हैं जो धरती पर उनके पापों का नाश करके उन्हें सीधे स्वर्ग का टिकट देने आयें हैं। ऐसे लोग स्वर्ग में अपनी जगह सुनिश्चित कराने के लिए अपने ख़ास दिनों में विकलांग व्यक्ति को कुछ ‘दान’ देते हैं और कहीं सड़क पर दिख जाने वाले विकलांग को प्रणाम करके अपने लिए मोक्ष का द्वार खोलते हैं। कहीं आप भी तो ऐसा... नहीं मानते न! अरे नहीं आप तो पढ़े-लिखे और बहुत समझदार इंसान हैं आप भला ये सब थोड़ी मानते होंगे। बस मन में एक जिज्ञाषा हुई तो पूछ लिया। देखिये आपके और समाज के तथाकथित सामान्य लोगों की तरह ही हम भी साधारण से इंसान हैं। हम ईश्वर के कोई दूत या स्पेशल पैकेज ले कर आये कोई दिव्य मानव नहीं हैं। यदि हमें समाज में कोई ख़ास इज्ज़त दिलाने के धेय से आपने दिव्यांग शब्द का ईज़ाद किया है तो विनम्रता पूर्वक कहती हूँ दिव्यांग जैसे हजारों शब्द भी हमें समाज में वो इज्ज़त नहीं दिला सकते क्यूँकी इज्ज़त कमानी पड़ती है। देश के प्रधानमन्त्री होने के नाते आप हमें आधारभूत संरचना और समान अवसर दें, हम समाज में अपनी पहचान और इज्ज़त बनाने का दम रखते हैं।

आलोकिता (एक विकलांग लड़की)