Monday, September 10, 2012

हकीकत से आँखें मूंद के जीना नासमझी नहीं



ना पूछ जिन्दगी में तेरी जरुरत क्या है 
जो तू नहीं तो फिर जिन्दगी की जरुरत क्या है 

हकीकत से आँखें मूंद के जीना नासमझी नहीं 
गर टूट भी जाए तो सपनो से खुबसूरत क्या है 

इश्क में डुबके जिसने खुद को भुलाया नहीं
क्या जाने वो की लज्ज़त-ए-मोहब्बत क्या है 

ख्वाब था इश्क, इबादत भी तू हो गया है 
कह दे जिन्दगी में तेरी मेरी अहमियत क्या है 

ना चाह के भी हर बार तुझे हीं लिख बैठती हूँ 
पूछ हीं देते हैं सब बेदर्द की शक्ल-ओ-सूरत क्या है