Thursday, May 5, 2011

राजकुंवर हीं तो आया है



जाने कब...... बूंदों सा बरसोगे मेरे आँगन में 
जाने कब.......फूलों सा  हंसोगे मेरे आँगन में 
इंतज़ार है मुझे अब...... हर पल उस घडी का 
जब होगा आगमन तुम्हारा.... मेरे आँगन में 

माँ तुम हर पल कुछ यूँ हीं तो सोचा करती थी
जाने क्यूँ... उस अंजाने की प्रतीक्षा करती थी 
देख ना माँ,...वह अजनबी तेरे घर आ हीं गया 
तू स्वागत में जिसके तैयारी किया करती थी 

देख न माँ वह सजीला राजकुंवर हीं  आया है 
बैंड-बाजा-बारात सब कुछ तो संग में लाया है 
माँ अब भी क्यूँ हैं इतनी तेरी ये आंखे  सजल 
तेरा वर्षों का ख्वाब अब पूरा होने को आया है 

कुछ क्षण ही बरसेंगी अब ये बूंदे तेरे आँगन में
कुछ पल ही मुस्कुराएंगे ये पुष्प तेरे आंगन में
ले जायेगा साथ फिर वो तेरे जिगर के टुकड़े को
छूट जाएँगी वो बरसों की यादें ही तेरे आंगन में 

7 comments:

  1. बहुत ही भावमयी रचना लिखी है…………अति सुन्दर्।

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  2. bheegi-bheegi si....atyant bhawpurn.

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  3. pyari si rachna ...virah aur bandhan dono ka yatharth chitran..
    bahut badhai...

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  4. बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना..अंतिम पंक्तियाँ तो दिल को गहराई तक छू गयीं..

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  5. marmik ,mohak srijan ,sadhvad ji .uhi likhate rahiye .

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  6. INSAN GUJAR JATE HAIN BAS YAADEN HI TO RAH JATI HAI. . . . JAI HIND JAI BHARAT

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