Friday, April 1, 2011

उलझी लकीरें

जिन्दगी है ये मेरी या कोई पहेली हैं  
हजारों में बैठी, क्यूँ तन्हा अकेली हैं 

बहारों में खिलती हैं कलियाँ सुना है 
काँटों नेही जाने क्यूँ मुझको चुना है  

हाथों कि लकीरें ये क्यूँ  ऐसी उलझी  
समझने में इसको.. हूँ मैं भी उलझी 

अंधेरों ने मुझको... कुछ ऐसे है घेरा 
छूटा  है मुझसे वो...  साया भी मेरा 

मगर ये सूरज फिर से होगा जवाँ जब 
फिर होगा  दर पे यारों का कारवां तब 

उलझी लकीरों में... कुछ तो लिखा हैं 
ये हम ना समझे पर.. समझा खुदा हैं  

दरारों में  किरणे कभी.. जाती हीं होंगी 
शैल शिखरों पे  बहारे भी आती हीं होंगी 

तनहाइयों कि महफ़िलें सजती हीं होंगी 
पहेलियाँ जिन्दगी की सुलझती हीं होंगी 

8 comments:

  1. बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति!

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    मूर्ख ही तो हैं

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  2. acchi rachna hai..
    paheliyan sulajh jaayengi...

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  3. अँधेरे जैसे जैसे बढ़ते हैं साया साथ होकर भी नज़र नहीं आता ... बहुत अच्छी रचना

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  4. वाह ...बेहतरीन शब्‍द रचना ।

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  5. बहुत सुन्दर रचना

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  6. बहुत ही बढ़िया
    नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनायें !
    माँ दुर्गा आपकी सभी मंगल कामनाएं पूर्ण करें

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  7. saath sab samay ke,
    har uljhan ki vajh mil jati hai...
    ek arzu hi to hai zindagi
    kabhi virane me bahar
    to kabhi sholon me bhi
    kaliyan khl jati hai...


    behatreen prastuti...

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