Tuesday, January 4, 2011

बगिया आज खिल उठी





कलियों के चटखने से 
बगिया आज महक उठी 
फूलों के मुस्कुराने से 
प्रकृति भी खिलखिला उठी



और भी रंगीन होती जा रहीं 
तितलियाँ रस पीकर 
दीवाने होकर देखो गा रहे 
सांवले सलोने भ्रमर 






गुजरा पवन इन्हें छूकर 
उसका रोम रोम महक उठा 
सहलाया बादलों को जाकर 
तो वह भी आज बहक उठा 


सारा स्नेह एकत्रित कर 
सर्वस्व अपना बरसा दिया 
कली को बूंदों से स्पर्श कर 
खुश हुआ औरों को हरसा दिया 


भीगी भीगी सी कलियाँ भी 
शर्मा कर झुक गईं 
जा रही थी जो हवा वह 
मंत्रमुग्ध होकर रुक गई 


मंद पवन का झोंका आया 
मुझको सारा हाल बताया 
शीतल सुवासित सुन्दरता से 
मेरा परिचय करवाया  













7 comments:

  1. आलोकिता जी, बहुत प्‍यारी है ये बगिया। आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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    मिल गया खुशियों का ठिकाना।
    वैज्ञानिक पद्धति किसे कहते हैं?

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  2. प्‍यारी बगिया।
    ..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

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  3. बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

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  4. आपके जीवन की बगिया हमेशा महकती रहे!

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  5. आलोकिता जी सुन्दर है कविता ..

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  6. ये परिवर्तन सुखद हैं आलोकित जी
    रंगों और रंगीन परिकल्पनाओं को पहचानने का हुनर सीख रही हैं आप
    बहुत अच्छा लगा पढ़ कर
    बधाई

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