Tuesday, December 7, 2010

कितना बदल गया है न सबकुछ अचानक | मैं जिसके लिए लिखना सबसे कठिन काम होता था, जो ९ बजते बजते सोने के लिए बेचैन हो जाता था, वही मैं आज रात के १:३० बजे बैठ कर डायेरी  लिख रहा हूँ और वो भी क्यूँ ? क्यूंकि अपने दिल की बात अपने सबसे अच्छे दोस्त अपने पापा से नहीं कह पा रहा | मैंने अपनी जिन्दगी में हमेशा आपको एक दोस्त की भूमिका में पाया है फिर अचानक आप इतने ऊँचे कैसे हो गए ? अचानक आप पिता बन गए जिसके पास सारे अधिकार है, जिसके सामने कुछ नहीं कह सकता क्यूँ पापा ? अब तक आप मेरी हर छोटी से छोटी खुशी का ख्याल रखा है पर जब मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशी मांगी तो आप मेरी खुशियों के दुश्मन बन बैठे क्यूँ पापा ?अगर मैं किसी से प्यार करता हूँ उसे अपनाना चाहता हूँ तो बीच में आपकी इज्ज़त और ये समाज कँहा से आ जाता है पापा? जिन्दगी मुझे गुजारनी है उसके साथ समाज को नहीं | आप ने और मम्मी ने तो कह दिया इतनी हीं पसंद है तो उसी के पास चले जाओ | उसमे और हममे से किसी एक को चुन लो | पर मेरे लिए ये इतना आसान नहीं है | धड़कन और सांसो में से किसी एक को कैसे चुन लूँ ? दोनों हीं जीवन के लिए उतने हीं जरुरी हैं | आप लोगों ने जब से कहा मैंने उससे बात भी नहीं की | देखिये न पापा उसका नाम तक नहीं लिख पा रहा| जेहन में उसका नाम आते हीं हाथ कांप जा रहे हैं |लेकिन मैं खुश नहीं हूँ पापा | जिन्दा तो हूँ पर मैं जी नहीं रहा हूँ |आप लोग कहते हैं की मैं बेशर्म हो गया हूँ, मेरी आँखों का पानी मर चुका है | लेकिन ऐसा नहीं है पापा| मेरी आँखों में पानी तो है पर गलती से, हाँ गलती से हीं इन आँखों ने कुछ सपने भी देख लिए हैं |
कई दोस्तों ने सलाह दी कि कोर्ट मैरेज कर लो तुम बालिग हो | वैसे देखा जाए तो सही हीं है न पापा मैं २४ साल का हो चुका हूँ वो भी तो २१ की है पर हम ये कदम नहीं उठा सके | न मैं आपके खिलाफ जा सका न वो अपने पापा की इज्ज़त को नज़रंदाज़ कर पायी | कैसी विडंबना है न पापा जिस माँ बाप ने हमे अधिकार का मतलब समझाया,अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया वही माँ बाप हमारे सहज अधिकार को नकार रहे हैं और हम कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं क्यूंकि हम जकड़े हुए हैं उनके प्यार के मोह में, बंधे हुए हैं अपने so called संस्कारों में | खैर ये सब मैं लिख गया आवेग में आप से कह नहीं पाउँगा न हीं आप कभी ये पढ़ पाएंगे क्यूंकि अगर आप इसे पढ़ भी लें तो क्या फ़ायदा ? कुछ पल के लिए एक पिता का दिल पिघल भी जाय तो क्या आपने अपने चारों ओर जो इज्ज़त और प्रतिष्ठा के ऊँचे ऊँचे दिवार खड़े कर रखे हैं उनको मैं नहीं हिला सकता | मैंने जो भी लिखा बस अपने मन की शांति के लिए लिखा है | उम्मीद तो नहीं पर शायद मन शांत हो जाए |मेरे अरमानो की तरह मेरी डायेरी का यह पन्ना भी राख हो जायेगा | फर्क सिर्फ इतना है की अरमानो को आपने जलाया इस पन्ने को मैं जलाऊंगा |यह तो जलकर राख हो जायेगा पर मेरे अरमान जलकर भी तड़प रहे हैं |   

10 comments:

  1. aaj key hamare samaj ki yah bahut badi samasya hai ek anuman lagaya jay to 74% youths k liye ye problem hai 24% khud aksar gf/bf change kartey rahtey hain aur 2% hin in lafdon se door hain isi liye maine yah wisay chuna

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  2. सामाजिक बन्धनों और रिश्तों को व्यक्त करती हुई रचना ,बधाई

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  3. विषय अच्छा चुना है, और प्रस्तुति भी बहुत भावपूर्ण है.आगे इस तरह के विषयों में अगर कोई सुझाव सूझे तो उसे भी आजमाए. लिखते रहिये ...

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  4. nice.....
    aatmik rishton par samaajik rashmon ke aaghaton ko darshata ek accha lekh.........

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  5. ..... भावपूर्ण प्रस्तुति

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  6. विचारणीय लेख के लिए बधाई

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  7. विचारणीय विषय ..... आपने तो बहुत प्रवाहमयी लिख डाला ...अच्छा लगा

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  8. Sunil ji, mazal sir, Abhishek bhaiya,Sanjay bhaiya aur Monika di Thanks

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  9. samyik mudde ko uthhati achchhi rachna.best of luck.

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