Tuesday, November 30, 2010

कर्म और भाग्य

तू कर्म कर,करती हीं जा |
रुक नहीं, आगे बढती हीं जा |
आशाएं है कई तेरे भीतर |
क्षमताएं भी अगणीत  तेरे अन्दर |
राह लम्बी हुई तो क्या ,
थक कर तुझे रुकना नहीं |
बाधाएँ बड़ी हुई तो क्या ,
डर कर तुझे झुकना नहीं |
भाग्य के आँचल में लिपट मत |
थाम ले तू कर्म का दामन |
मुश्किल बाधाओं से तुझे डरना नहीं |
बुझदिली का काम तुझे करना नहीं |
मुश्किलें जब जब आतीं हैं ,
पत्थर को हीरा कर जातीं हैं | 
आग में तपे बिना, सोने को चमक मिलती नहीं |
पत्थर पर पिसे बिना, मेहंदी की लाली खिलती नहीं |
मेहनत हीं है सच्चा श्रींगार तेरा |
कर्म से हीं होगा उद्धार  तेरा  |
सौभग्य पर इठला नहीं |
दुर्भाग्य से झल्ला नहीं |
जिन्दगी की आसमां के ये टिमटिमाते तारे |
कर्म सूर्य  के उदित होते छिप जाते सारे |
जब सूरज तेरे हाथ में तो 
तारों की क्यूँ फिकर तुझे ?
जब कर्म तेरे साथ में तो 
भाग्य से क्यूँ डर तुझे ?
जुड़ी तुझसे है आशाएं अपार | 
खोल न तू निराशाओं  के द्वार |
कर्म से जीत सके नियति में इतना दम कँहा ?
तुझे पराजित करे उसे इतनी हिम्मत कँहा ?
बस तू कर्म कर करती हीं जा |
भाग्य को छोड़ आगे बढती हीं जा | 


6 comments:

  1. गीता का सार भी तो यही है //
    आलोकित //
    कभी मेरे ब्लॉग पर भी पधारे

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  2. ye bahut badi baat kah di aapne mere blog tak aane key liye dhanyawaad

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  3. This comment has been removed by the author.

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