Tuesday, November 30, 2010

कर्म और भाग्य

तू कर्म कर,करती हीं जा |
रुक नहीं, आगे बढती हीं जा |
आशाएं है कई तेरे भीतर |
क्षमताएं भी अगणीत  तेरे अन्दर |
राह लम्बी हुई तो क्या ,
थक कर तुझे रुकना नहीं |
बाधाएँ बड़ी हुई तो क्या ,
डर कर तुझे झुकना नहीं |
भाग्य के आँचल में लिपट मत |
थाम ले तू कर्म का दामन |
मुश्किल बाधाओं से तुझे डरना नहीं |
बुझदिली का काम तुझे करना नहीं |
मुश्किलें जब जब आतीं हैं ,
पत्थर को हीरा कर जातीं हैं | 
आग में तपे बिना, सोने को चमक मिलती नहीं |
पत्थर पर पिसे बिना, मेहंदी की लाली खिलती नहीं |
मेहनत हीं है सच्चा श्रींगार तेरा |
कर्म से हीं होगा उद्धार  तेरा  |
सौभग्य पर इठला नहीं |
दुर्भाग्य से झल्ला नहीं |
जिन्दगी की आसमां के ये टिमटिमाते तारे |
कर्म सूर्य  के उदित होते छिप जाते सारे |
जब सूरज तेरे हाथ में तो 
तारों की क्यूँ फिकर तुझे ?
जब कर्म तेरे साथ में तो 
भाग्य से क्यूँ डर तुझे ?
जुड़ी तुझसे है आशाएं अपार | 
खोल न तू निराशाओं  के द्वार |
कर्म से जीत सके नियति में इतना दम कँहा ?
तुझे पराजित करे उसे इतनी हिम्मत कँहा ?
बस तू कर्म कर करती हीं जा |
भाग्य को छोड़ आगे बढती हीं जा | 


Monday, November 29, 2010

वह नारी

देखा था मैंने 'उस' नारी को,
फूलों सी कोमल सुकुमारी को |
जन्म लेते होठों पर उसकी एक हँसी खिली थी,
परियों सी प्यारी वह एक नन्ही कली थी|
उन आँखों में कुछ आशा थी,
पर चारों ओर निराशा थी|
निराशा थी कुछ गरीबी की,
कुछ थी 'उसके' जन्म की |
डर था कुछ चिंताएं थीं ,
भय और कुछ शंकाएँ भी |
क्या यह नन्ही कली खिल पायेगी ?
या गरीबी के धुल में मिल जाएगी ?
क्या यौवन का फूल हँस पायेगा ?
या किसी के हाथों मसला  जायेगा ?
सीता के लिए था एक रावण,
जो अब कदम कदम पर बसता है |
महाभारत में था था एक दुर्योधन,
पग पग पर जो अब हँसता है |
सीता को तो राम मिले थे,
द्रौपदी को कृष्ण सहाय हुए थे |
इसे भी कोई राम मिलेगा क्या ?
इसके लिए कोई कृष्ण बनेगा क्या ?
नियति उसके साथ में नहीं था,
मौत भी उसके हाथ में नहीं था |
जन्म लिया तो उसे जीना ही था,
गम को खाके आंसुओं को पीना हीं था|
अध् खिली थी यौवन  की कली अभी ,
पर संकटें आ चुकी थी सभी |
हर एक कदम पे रावण, तो दुसरे पर दुर्योधन खड़ा था |
न राम ना हीं रक्षा में उसके कोई कृष्ण खड़ा था |
मौके पर सबने उसे अंगूठा हीं दिखलाया |
काम आया तो बस आत्मबल हीं काम आया |
नहीं थी वह निर्बल, शक्तिहीन, अबला |
थी वह तो सबल, सशक्त, सबला |
देखा है आज भी मैंने उस नारी को ,
कष्टों में घिरी देखा उस  बेचारी को |
होठों पर उसके अब हँसी नहीं है ,
आँखों में अब आशाएं नहीं है |
गरीबी की भट्टी और भाग्य के आंच में खूब तपी है ,
पर चमकता सोना नहीं वह तो पत्थर बन चुकी है |
पत्थर क्यूँ? क्यूंकि वह रोती  नहीं है ?
री अभागिनी तू क्यूँ रोती नहीं है ?
हाँ वह क्यूँ रोएगी ? रोकर वह क्या पायेगी ?
रोने से क्या नियति बदल जाएगी?
विधि को उसपे तरस  आएगी ?
नहीं वह नहीं रोएगी कभी नहीं रोएगी |
भाग्य नहीं कर्म हीं की होकर रहेगी |
कर्म हीं से से तो वह रोटी पायेगी |
भाग्य भरोसे बस आँसु पायेगी |
रोकर वह क्या क्या कर पायेगी ?
क्या भाग्य को बदल पायेगी ?
नहीं वह दरिद्र है, दरिद्र हीं रह जाएगी |
नारी है बस नारी हीं रह जाएगी |
पत्थर है सोना नहीं बन पायेगी |
हाँ मजदूरनी है बस वही बनी रह जाएगी |


Sunday, November 28, 2010

मेरी प्यारी सपना
हो सके तो मुझे माफ़ कर देना |वैसे मैंने अपनी इस छोटी जिंदगी में जितनी गलतियां , नहीं गलती कहना एक और गलती होगी मैंने जितने पाप किये हैं उसके लिए तो शायद भगवन भी माफ़ न कर सके | सच कहूँ तो मैं दौलत की लालच में अँधा हो गया था बिल्कुल अँधा |जानता हूँ आत्महत्या कायर लोग करते हैं पर मैं जीकर भी तो हरपाल मरता हीं रहूँगा, दिल पर इतना बोझ लेकर, इतनी आंहे लेकर मैं नहीं जी सकता | आत्महत्या कानून की नजर में अपराध है, तो मैं कानून पर चला हीं कितना हूँ ? मैं भी तो एक अपराधी हीं हूँ | इस दूनिया से जाने से पहले मैं अपने दिल की बात तुम्हे बताना चाहता था पर मैं कह नहीं सकता इसलिए
ये पत्र लिख रहा हूँ | इस इन्टरनेट के ज़माने में पत्र अजीब लगता है न पर सपना यह पत्र नहीं मेरे जीवन का सारांश है | बचपन से मुझे अच्छे स्कूल में पढाया गया वँहा बहुत से आमिर बच्चे भी थे जिनकी रईसी देख मैं ललच जाता था | बिल्कुल तुम्हारी तरह माँ भी समझाती रहती थी | मैं काफी तेज़ स्टुडेंट भी था ये तो तुम जानती हीं हो | मेरी महत्वाकांक्षाएं भी काफी बड़ी थीं | जिस दिन I.I.T के लिए मेरा सेलेक्सन हुआ था माँ इतनी खुश थीं मनो मैं विश्व विजय करके लौटा हूँ | आज जब अतीत के पन्नों पर झांकता हूँ तो लगता है जैसे मेरे जीवन का सबसे काला दिन वही था |कितने कोचिंग वालों ने contact किया था मुझसे| कोई ५० हज़ार तो कोई ७५ हज़ार देने को तैयार थे सिर्फ अपना फोटो और लिखित प्रमाण देने के लिए की मैंने उनकी कोचिंग से पढाई की है | पापा ने माना किया पर मैंने अपनी कसम देकर उन्हें मना लिया| उस दिन एक दिन में मैंने डेढ़ लाख कमाए थे | उसी दिन से मेरे सर पर दौलत का भुत स्वर हो गया | पहला सेमेस्टर ख़त्म हीं हुआ था की एक कोचिंग वाले सर ने फिर मुझसे कांटेक्टकिया और कहा आने वाले एंट्रेंस एक्साम में एक लडके की जगह तुम्हे परीक्षा देनी है ३ लाख मिलेंगे | एक परीक्षा और ३ लाख मैं बहुत खुश हुआ पर पापा मम्मी  की ईमानदारी का
सबक याद आ गया | मैंने अनमने ढंग से कहा सेटिंग  नहीं सर ये गलत है |शायद उन्होंने ३ लाख के नाम पर मेरी आँखों में आये चमक को भांप लिया था |मुझे समझाने लगे की ये तो समाज सेवा है बेचारे जो बच्चे खुद से पास नहीं कर पते उन्हें पास करना है और ऊपर से पैसे भी तो मिल रहे हैं |मुझे पुलिस के डंडे से भी बहुत डर लगता था | उन्होंने मेरे सिनिअर से मिलाया जो  पहले से इस काम में था, उसे ५ लाख मिल रहे थे | वह बड़े स्तर की परीक्षा  देने वाला था मुझे तो स्टेट लेवल देना था अनुभवी नहीं था न |उसके बाद मैं आगे बढ़ता गया या कह लो जुर्म की दलदल में धंसता गया | बहुत बड़ा दल था, मेडिकल, इंजीनियरिंग, रेलवे सबका सेटिंग कराया जाता था और सेटिंग भी तरह तरह के |पता है मैं पहले सोचता था कि लडकियां रिस्क नहीं लेतीं पर उस दल में शामिल होने पर पता चला कि लडकियां यंहा भी पीछे नहीं है |हमारी शादी के बाद जब तुमने समझाया मैंने कोशिश की पर छोड़ नहीं पाया |तुमसे झूठ कह दिया कि मैंने गलत काम छोड़ दिया | अब मैं परीक्षा देता नहीं बस बच्चों को तैयार करता हूँ उस कोचिंग वाले सर कि तरह | तुमसे ज्यादा वफादारी मैंने उन लोगों के साथ निभाई है | सबसे हेड कौन है
ये तो मैं आज भी नहीं जानता पर कैसे कैसे सेटिंग होता है मैं सब जानता हूँ | जब हमे ज्यादा स्टुडेंट्स मिल जाते हैं उस बार पूरे सेंटरको हीं खरीद लिया जाता है| स्टुडेंट्स भी अपने, इन्विस्लेटर भी अपने और गार्ड्स भी अपने | जँहा एक दो स्टुडेंट्स होते हैं उनके लिए मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है | उनके जैसे मिलते जुलते चेहरे वाले बच्चे को ढूंढा जाता है फिर हमारे फोटोग्राफर दोनों बच्चों के चेहरे को मिलाकर फोटो बनाते हैं |खैर मैं तुम्हे डिटेल में क्यूँ बताऊँ ? कंही तुम भी सेटिंग करने लगी तो ........हाहा हा हा just kidding yaar .जीवन में मेरी यह आखिरी हँसी है (हँसने का मुझे हक है भी नहीं ) कितने बच्चों का कैरिअर बर्बाद किया है | कितने हीं बच्चों ने आत्महत्या तक कर ली | सोचकर बुरा लगता था पर पैसे देख सब भूल जाता था मैं | जिन बच्चों को मैंने पास कराया उनके लिए भी तो गलत हीं किया | मैं सब भूल सकता हूँ पर रवि कि मौत नहीं | उसे इस दलदल में लेन वाला तो मैं हीं था | हम दोनों ने साथ में इन सब कामों को छोड़ना चाहते थे | हमारे खिलाफ बहुत सबूत थे उन लोगों के पास, मैं डर गया उन लोगों की धमकी से पर रवि नहीं डरा | उसने  आत्मसमर्पण कर दिया संयोग से ईमानदार इंस्पेक्टर भी मिल गया पर नतीजा क्या हुआ ?रवि को मार डाला गया और क़त्ल के इल्जाम में वह इंस्पेक्टर जेल गया | रवि इस दूनिया में नहीं रहा उसके गम में चाची मर गयी चाचा पागल हो गए सब की वजह मैं हूँ |उस इंस्पेक्टर के २ बच्चे अनाथों की जिन्दगी जी रहे हैं मेरी हीं वजह से | कहते हैं जब जागो तभी सवेरा पर हमारे जुर्म की दुनिया में जिसका जमीर जग जाता है उसके जीवन में अँधेरा छा जाता है | इतने सारे पापों का बोझ लेकर मैं नहीं जी सकता सपना नहीं जी सकता मैं | मेरे सारे गुनाहों की तो माफ़ी मिल नहीं सकती |तुम्हारे साथ तो मैं सात वचन तक निभा नहीं सका | हो सके तो मुझे माफ़ कर देना सपना |
तुम्हारा (कभी बन नहीं सका )
अविरल

Friday, November 26, 2010

क्या मैंने गलत किया ?

मैं दुर्गा कई दिनों से एक कशमकश से जूझ रही हूँ | एक अंतर्द्वंद में पीसी जा रही हूँ |किस से कहूँ अपने दिल की हालत पर आज अगर खुद को व्यक्त न करूँ तो शायद यह अंतर्द्वंद मुझे मर हीं डाले | मैं सिर्फ यही सोच रही हूँ कि क्या मैंने गलत किया ? आज भी याद है मुझे अपना बचपन जब मैं कुछ भी कहती पापा मुझे वह खरीद कर देते थे और मैं पगली डरती थी कि कहीं दुकानदार अपनी चीज़ वापस न ले ले तब एक दिन पापा ने समझाया था कि मैंने जो चीज़ पैसे देकर खरीद दी  वह तुम्हारा हो गयी  | अब दुकानदार का उसपर कोई हक नहीं | पापा ने मेरी हर मांग पूरी की है मैंने भी उनका हर कहना माना है | मैं पापा की एकलौती संतान हूँ  इसलिए उनकी सारी आशाएं भी मुझसे हीं जुडी थी | उनका सबसे बड़ा ख्वाब  था मेरा I.A.S बनना ताकि जिन लोगों ने उन्हें बेटी का बाप होने पर ताने मारे थे और बेटों का घमंड दिखाया था उन लोगों का मुंह बंद हो सके | मैंने भी जी जान लगा दी और मेरे I.A.S बनते हीं लोगों के मुंह पर ताला भी पड़ गया | पापा फुले न समाते थे तब माँ ने याद दिलाया की मैं एक बेटी हूँ, पराया धन | पापा को भी एहसास होने लगा की जवान बेटी बाप के कंधे पर बोझ होती है और मुझ बोझ को उतारने का वक्त आ गया है | आत्मनिर्भर हो कर भी मैं एक बोझ थी | खैर मेरे लिए उपयुक वर की तलाश होने लगी | जल्द हीं यह तलाश ख़त्म हो गयी | मुझ से ३ बैच सीनियर एक I.A.S ढूंढा था मेरे पापा ने अपनी लाडो के लिए | सभी कह रहे थे लड़का हीरा है हीरा और उस हीरे की कीमत  उसके जौहरी माँ बाप ने  तय किया था २५ लाख | मैंने पापा से कहा दहेज़ .......ये गलत है पापा | उन्होंने कहा यही रीत है बेटी और फिर मेरी सारी कमाई तेरे लिए हीं तो है, तू ज्यादा सोच मत कुछ भी गलत नहीं है | माँ ने इज्जत, मान-मर्यादा बहुत कुछ समझाया जिसका सारांश था कि अपने पापा की परेशानी में परेशां होने का अब कोई हक नहीं था मुझे | पापा परेशान हो तो हो आँख बंद करके मुझे विवाह वेदी पर चढ़ जाना है  और किसी और के घर की खुशी बन कर अपने माँ बाप को भूल जाना है | इसी में मेरी भलाई और पापा की इज्जत है | अपनी भलाई का तो नहीं पता पर पापा की इज्जत के लिए मैं चुप रही |जिन्दगी भर स्वाभिमान से जीने वाले मेरे पापा को अपने भाई और न जाने किसके किसके
सामने हाथ फैलाना पड़ा | सबके मुंह पर मैंने जो ताले डाले थे वो खुल गए | तानों की झड़ी लग गयीमैं चुप रही |क्या मैंने गलत किया ?माँ को को रोता देख मैंने ठान लिया कि माँ के आँसु और पापा के अपमान सबका बदला लूँगी| उन दहेज़ लोभिओं के घर बहु नहीं काल बनकर जाऊँगी| क्या मैंने गलत किया ? आदरणीय ससुर जी को मैंने आदर नहीं दिया | पूज्य सासू माँ की मैंने पूजा नहीं की, उनकी हर ईंट का जवाब मैंने पत्थर से दिया | क्या मैंने गलत किया ? पैसे ले लेने के बाद जब २५ रु. की गुडिया पर दुकानदार का कोई हक नहीं रहता तो इस सजीव गुड्डे(मेरे पति) पर मैं उसके माँ बाप का हक कैसे रहने देती ? इसके लिए तो पापा ने २५ लाख दिए थे |ज्यादा परेशानी भी नहीं हुई क्यूंकि वो अब बच्चे नहीं थे जो उन्हें माँ की जरुरत होती, उनकी जवानी को बीवी की जरुरत थी, मेरी जरुरत थी | स्वार्थी मानव |एक माँ बाप से मैंने इकलौता बेटा छीन लिया | क्या मैंने गलत 
किया ? मैं उनसे (पति ) न डरती हूँ न दबती हूँ |पैसे का रौब वो नहीं झाड़ सकते मुझ पर क्यूंकि मैं आत्मनिर्भर हूँ |मैंने उनकी गुलामी कभी नहीं की, क्या मैंने गलत किया ?एक दिन मेरी सास ने कहा था "पराये घर की बेटी है, जाने क्या संस्कार ले कर आई है |" बहुत चुभी थी मुझे यह बात | मायेके के लिए मैं पराया धन थी और ससुराल के लिए पराये घर की बेटी | मैंने अपने सास ससुर को वृधाश्रम भेज दिया है | मैंने अपना घर पा लिया है |ये घर मेरा अपना है और मैं इस घर की अपनी | क्या मैंने गलत किया ? पापा ने जो भी कर्ज लिया था मैंने चुका दिया है | क्या मैंने गलत किया ? सब कहते हैं मैंने घर तोड़ दिया |हाँ सच है मैं अच्छी, आदर्श बहु नहीं बन पायी |माँ पापा को रुलाने वालों को अपना कर उनकी सेवा मैं नहीं कर पायी | पर क्या मैंने गलत किया ? यही सोच कर घुट रही हूँ की क्या मैंने गलत किया ?

Thursday, November 25, 2010

शायरियाँ

सब कहते हैं, तू उसे याद न कर
पाने को उसे रब से फ़रियाद न कर 
तू हीं बता धड़कन में बसी यादों को मिटायें तो कैसे ?
जिन्दगी को अपनी हम भुलाएँ तो भुलाएँ कैसे ?
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आप मेरे लिए कोई फ़रिश्ता तो नहीं 
आप से हमारा कोई रिश्ता तो नहीं 
फिर भी पता नहीं क्या अपनापन झलकता है 
आपके सामने तो हमे सारा जग बेगाना लगता है 
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हम रो न सके तो ये न समझना, जुदाई का हमे गम नहीं 
रो कर प्रियतम की यादों को बहा देने वालों में से हम नहीं 
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आपकी बाँहों में मर जाना चाहते थे हम 
दो पल में पूरी जिन्दगी जी जाना चाहते थे हम 
शायद खुदा को वो भी गँवारा न हुआ 
क्योंकि वो दो पल भी हमारा न हुआ 
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इस दुनिया के लिए तो बस एक इंसान हो तुम 
मेरे लिए तो मेरा पूरा जहाँ हो तुम 
करोडो में एक तारा टूट गया तो क्या 
इस दूनिया से एक इंसान रूठ गया तो क्या 
कर सको तो इतना एहसान करो तुम 
रूठ कर यूँ न हमारी दूनिया वीरान करो तुम 
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हमने सोचा न था कभी किश्मत ऐसा रंग लायेगा/ लाएगी 
हमे मझधार में छोड़ तू परायों का हो जायेगा/ जाएगी 
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अजीब किस्मत है हमारी 
अजीब फितरत है हमारी 
जिसने दिल को तोड़ा 
दिल में उसे बसाये रहते हैं 
ख्वाबों को जिसने तोड़ा 
सपनों में उसे सजाये रहते हैं 
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सागर पर चलना चाहा 
हमसे किनारे भी छुट गए 
परायों को अपनाना चाहा 
वो न मिले कुछ अपने भी रूठ गए 
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तुझे याद हम करते नहीं 
तेरी याद हमे आ जाती हैं 
आती भी है तो कुछ ऐसे 
की भीड़ में हमे तन्हा कर जाती है 
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सोचा था तुझपे प्यार लुटाकर 
तेरे दिल में घर बनायेंगे 
हमे क्या पता था दिल देकर 
भी हम बेघर रह जायेंगे 
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वफ़ा कर के भी हम उन्हे पा न सके 
बेवफा हो कर भी हमारे दिल से वो जा न सके 
रातों को उनकी अपनी ख्वाबों से हम सजा न सके 
नींदे उड़ा कर भी हमारे खवाबों से वो जा न सके 
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Tuesday, November 23, 2010

पन्ने जीवन के

जीवन के बीते पन्नों को पलटो मत
उन बीते लम्हों में  उलझो मत 
उन लम्हों में है वही जो पूर्व घटित है 
उन पन्नों पर लिखी कहानी अमिट है 
नहीं जिन पन्नों पर तुम्हारा अधिकार 
उसकी चिंता करना है बेकार 
जो कुछ करना है वह आज करो 
वर्तमान जीवन में नए रंग भरो 
वर्तमान में लिखावट सुन्दर हो 
इन पन्नों की सजावट सुन्दर हो 
भविष्य सुनहरा हो जायेगा 
यह आज भी बीता कल हो जायेगा 
इस आज को जो गँवा दिया तुमने 
सपने बस रह जायेंगे सपने 
जीवन की किताब जो बंद हो जाएगी 
कौड़ी के भाव रद्दी में बिक जाएगी 
जीवन की ऐसी कहानी लिखो, की सुनहरा इतिहास बन जाए 
सब पढे उस कहानी को, और तू उनका नायक बन जाए 
                                             आलोकिता 

Sunday, November 21, 2010

जल एक -- रूप अनेक

जल है एक, इसके रूप अनेक 
जब है प्यास हमे सताता 
जल अमृत तुल्य हो जाता 
आँसू बन जब नयनों से बहता 
तो दर्शाता है यह विवशता 
पश्चाताप के आँसू बन 
मन के सारे मेल धो देता 
कभी ये आँसू तेजाब बन 
पत्थर दिल को भी पिघला देता 
जब गोताखोर जल में डुबकी लगाता
तब जल उसके लिए कर्मभूमि बन जाता 
यही जल बारिश कि बुंद बन जब बरसता 
प्यासी धरती की तब प्यास बुझाता 
गर्मी के बाद यह वातावरण में ठण्ड लाता
बेचैन लोगो को चैन दिलाता 
फिर खेतों में हरे हरे फसल लहराता 
जलचरों का ये घर भी तो है होता 
मेहनती लोगों से पसीना बन टपकता 
उनके माथे पर मोती सा चमकता 
यही जल जब बाढ़ बन कर आता 
लाखों जीवन को तबाह कर देता 
इंसानों जानवरों सब के लिए काल होता 
खेतों को भी बर्बाद कर देता 
जल तो हर जगह है होता 
धरती पे अम्बर में जल 
जीव में जंतु में इंसानों में जल 
विष्णु के नख शिव के शिख 
ब्रम्हा के कमण्डल में जल 
जल तो सर्वव्यापी है 
कभी पुण्यात्मा तो कभी पापी है 

Saturday, November 20, 2010

गंगा की धारा

मैं हूँ बहती निर्मल धारा गंगा की 
 यात्रा करती हिमालय से बंगाल कि खाड़ी तक कि
                    हुआ था हिमालय के गोमुख में 
                     पावन निर्मल जन्म मेरा 
                     बीता था हरिद्वार तक में 
                     चंचल विह्वल बचपन मेरा
फिर मैं आगे बढती हीं गयी 
कठिनाई बाधाओं को तोड़ती गयी  
                      पथरीले इलाके को छोड़कर 
                      आई मैं समतल जमीन पर 
                      फिर क्या था बरस पड़ा मुझपर 
                      मनुष्यों का भारी कहर 
उद्योगों के कचडे, मल, मूत्र इन सभी को 
मुझमे समाहित कर डाला 
मुझको तथा मेरी जवानी को 
इन्होने मलिन कर डाला 
                      मैं सहनशीलता की मूरत बन 
                      बस आगे बढती हीं गयी 
                      फिर दया की पात्र बन 
                      बंगाल कि खाड़ी में शरण ली 
मैं बन गयी बेबश मलीन धारा गंगा की
यात्रा पूरी हुई हिमालय से बंगाल कि खाड़ी तक कि 

Friday, November 19, 2010

अजन्मी बेटी

19 नवम्बर यानि आज का दिन हमारे देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन है | आज के दिन हमारे देश में एक बेटी ने जन्म लिया था एक ऐसी बेटी ने जिसने सिर्फ अपने माँ बाप का हीं नहीं बल्कि पूरे देश का नाम रौशन किया | जी हाँ आज चाचा नेहरु की प्यारी इंदु और हमारे देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की जयंती है | बहुत बुरा लगता है कि जिस देश में इतनी महान बेटी  ने जन्म लिया हो उस देश में आज भी कन्या भ्रूण हत्या जैसे घृणित पाप को अंजाम दिया जाता है |गर्भपात के दौरान मारी जाने वाली बच्चियों कि जगह खुद को रखकर कल्पना कीजिये तो रूह तक कांप उठेगी | कैसा लगता होगा उन्हें ? क्या सोचती होंगी वे ?शायद वे भी कुछकहना चाहती होंगी अपनी माँ से ,अपने परिवार वालों से .......................................

अजन्मी बेटी  
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सुनो मुझे कुछ कहना है 
हाँ तुमसे हीं तो कहना है 
क्या कहकर तुम्हे संबोधित करूँ मैं ?
मैं कौन हूँ कैसे कहूँ मैं ?
एक अनसुनी आवाज़ हूँ मैं 
एक अन्जाना एहसास हूँ मैं 
एक अनकही व्यथा हूँ मैं 
हृदय विदारक कथा हूँ मैं 
एक अजन्मी लड़की हूँ मैं 
मैं हूँ एक अजन्मी लड़की 
हाँ वही लड़की जिसे तुम जीवन दे न सकी 
हाँ वही मलिन बोझ जिसे तुम ढो न सकी 
अगर इस दुनिया में मैं आती, तुम्हारी बेटी कहलाती 
कहकर प्यार से माँ तुम्हे गले लगाती 
माँ तुम्हे कंहूँ तो कैसे ? जन्म तुमने दिया ही नहीं 
बेटी खुद को कहूँ तो कैसे ?जन्म तुमने दिया ही नहीं 
तुम सब ने मिलकर निर्दयता से मुझे मार डाला 
मेरे नन्हे जिस्म को चिथड़े चिथड़े, बोटी बोटी कर डाला 
सिर्फ लड़की होने की सजा मिली मुझको 
फाँसी से भी दर्दनाक मौत मिली मुझको 
सोचो क्या इस सजा की हकदार थी मैं ?
 कहो तो क्या इतनी बड़ी गुनाहगार थी मैं ?
इंदिरा गाँधी, किरण बेदी मैं भी तो बन सकती थी 
नाम तुम्हारा जग में रौशन मैं भी कर सकती थी 
दलित, प्रताड़ित अबला नहीं सबला का रूप धर सकती थी 
तुम्हारे सारे दुःख संताप मैं भी तो हर सकती थी 
तुम्हारी तमनाएँ आशाएं सब को पूरा कर सकती थी 
न कर सकती तो बस इतना बेटा नहीं बन सकती थी 
बेटे से इतना प्यार तो बेटी से इतनी घृणा क्यूँ ?
दोनों तुम्हारे हीं अंश फिर फर्क उनमे इतना क्यूँ ?
काश ! तुम मुझे समझ पाती 
प्यार से बेटी कह पाती 
काश ! मैं जन्म ले पाती 
जीवन का बोझ नहीं प्यारी बेटी बन पाती 






                                                                                                

Tuesday, November 16, 2010

जीवन पथ

था एक अन्जाना अजनबी सा रास्ता
जहाँ न किसी से किसी का कोई वास्ता
अचानक एक नारी आई भीड़ से निकलकर
गोद में एक प्यारे से शिशु को लेकर
गोद से आया वह शिशु उतरकर
कदम बढाया माँ की ऊँगली पकड़कर
जमीन पर गिर गया वह लड़खड़ाकर
माँ ने कुछ  साहस दिया उसे उठाकर
चलते चलते उसने चलना सिख लिया
मासुम मुस्कान से माँ का ह्रदय जीत लिया
जीवन पथ पर एक मोड़ आया तभी
जिसके बारे में उसने सोचा न था कभी
माँ बोली जा जीवन पथ पर खोज ले मंजिल का पता
व्यर्थ तेरा जन्म नहीं दूनिया को इतना दे बता
जीवन के इस पथ पर अकेले हीं तुझे चलना है
यह एक संग्राम अकेले हीं तुझे लड़ना है
इस तरह और भी कुछ समझा बुझा कर
कहा उसने जा पुत्र अब देर न कर
सुगम थी राह , वह आगे बढ़ने लगा
निर्भीक, निडर सा वह आगे चलने लगा
मंजिल की राह होती इतनी आसान नहीं
इस बात का था उसे अनुमान नहीं
वह मार्ग अब दुर्गम होने लगा
साहस भी उसका खोने लगा
सामने माँ का चेहरा मुस्कुराने लगा
आगे बढ़ने की हिम्मत बढ़ाने लगा
फिर से आगे बढ़ने लगा ताकत बटोरकर
समस्याएँ आने लगीं और बढ़चढ़  कर
ठोकर खाकर अब वह नीचे गिर पड़ा
कुछ याद कर फिर से हो गया खड़ा
खुद हीं बोला आत्मविश्वास से भर कर
अब रुकना नहीं मुझे थककर
देखो पथ पर अग्रसर उस पथिक को
शक्ति पुत्र, साहस के बेटे, धरती के तनय को
भयंकर धुप अंधड़ और वर्षा उसने सब सहा
दामिनी से खेला, संकटों को झेला पर आगे बढ़ता रहा
कुछ साथी भी बने उसके इस राह में
संकटों को छोड़ा,तो कोई ठहर गए वृक्ष की छांह में
सीखा उसने मिलता नहीं कोई उम्र भर साथ निभाने को
यहाँ तो मिलते हैं राही बस मिल के बिछड़ जाने को
उस साहसी मन के बली को
तृष्णा मार्ग से डिगा न सकी
उस सयंमी चरित्र के धनि को
विलासिता भी लुभा न सकी
मंजिल पर ध्यान लगाय वह आगे बढ़ता रहा
मन को बिना डिगाए  संकटों से लड़ता रहा
आखिर जीवन में वह शुभ दिन आ हीं गया
वह पथिक अपने पथ की मंजिल पा हीं गया
सफलता उसके कदम चूमने लगी
खुशियाँ चारों ओर झूमने लगीं
कल तक थे अन्जान, आज उससे पहचान बनाने लगें
सम्मान का सम्बन्ध तो कोई ईर्ष्या का रिश्ता निभाने लगे
सबने देखा सफलता को उसका चरण गहते हुए
न देखा किसी ने मुश्किलें उसे सहते हुए
आज जो वह पथिक मंजिल तक आया है
भाग्य का नहीं उसने कर्म का फल पाया है
संसार का तो यही नियम चलता आया है
यूँहीं नहीं सबने कर्म को भाग्य से बली बताया है

Monday, November 15, 2010

'''''''''''''वसंत से पतझड़'''''''''''''''

देखो बागों का या यौवन आज खिल रहा
तभी तो मधुमास उसका आलिंगन कर रहा
नव पुष्पों से बागों का श्रृंगार हो रहा
तभी तो बसंत का दिल धड़क रहा
सुन्दर सुन्दर पुष्प आज खिल रहे
भँवरे आकर मधुर गुंजन कर रहे
पुष्प सुगंध चहु दिशा में फैला रहे
तभी तो तितलियों के झुण्ड दौड़े आ रहे
रूप रंग गंध सब का मज़ा  लेने को
मनोरम दृश्य को स्मृति में भर लेने को
मानव भी दौड़ा चला आया
बागों का रूप देखकर ललचाया
कल बागों में जब यौवन न होगा
मधुमास का तब आलिंगन न होगा
पुष्पों का श्रृंगार जब टूट जायेगा
वसंत बागों से तब रूठ जायेगा
सारे पुष्प जब मुरझा जायेंगे
भौंरे कहीं न नजर आयेंगे
पुष्पों में जब सुगंध न होगा
आसपास तब तितलियों का झुण्ड न होगा
मानव भी फूलों को रौंद चला जायेगा
उन बेचारों की तरफ उसका ध्यान न जायेगा
बागों में भयानक सूनापन तब छाएगा
पतझड़ का मौसम उसके समीप जब आएगा
                                               आलोकिता .....

Sunday, November 14, 2010

बालदिवस की वो यादें..........................

आज १४ नवम्बर है ना, चाचा नेहरु का जन्मदिन यानि की बालदिवस | आज मुझे अपने स्कूल की बहुत याद आ रही है, बहुत अधिक |यही तो वह दिन था जिस दिन बच्चा होना बुरा नहीं लगता था| बाकी साल के ३६४ दिन तो यही सोचा करते थे की हम बच्चे क्यूँ हैं ? काश की हम बड़े होते कितना अच्छा  होता | अरे यार अब तो हमारी हालत और ख़राब हो गयी है| ना बच्चों की तरह हमारी गलतियां ही माफ़ होती हैं ना बड़ो की तरह हम आज़ाद हीं हैं | खैर बचपन की बात करते हैं | कितना अच्छा लगता था वह बाल दिवस समारोह वो नाच गाना, भाषण बाजी, टॉफी चॉकलेट, वो चन्दन का टीका, वो गुलाब का फूल और सबसे अच्छा तो लगता था सालभर अपने इशारों पर नाचने वाले टीचर्स को ठुमका लगाते देखना | कई कारणों से मैं बहुत से स्कूलों में पढ़ी हूँ इसलिए मेरे पास तरह तरह की यादें हैं इस दिन की | हर जगह अलग अलग तरह से मनाया जाता था बालदिवस |बचपन में बच्चा होना तो बुरा लगता हीं था पर उससे भी बुरा लगता था बड़ों का ये मानना की बच्चों की जिन्दगी में कोई टेंशन नहीं होता | अजी हमारे पास भी तरह तरह के टेंशन हुआ करते थे | जब मैं ६ क्लास में पढ़ती थी मम्मी की इसी बात से मुझे गुस्सा आया था की बच्चों को टेंशन हीं नहीं होता | अब मैं कैसे कहती की हमारे सबसे बड़े टेंशन तो आप बड़े लोग हीं हो | मैं बड़े शालीन बच्चे की तरह चुपचाप वहाँ से चली गयी पर मैंने सोच लिया था की मुझे बच्चों को इन्साफ दिलाना है और इन लोगो की ग़लतफ़हमी को दूर करना है मैंने एक कविता लिखी और सचमुच उस दिन माँ मानगयी की बच्चों के पास भी टेंशन होता है| हाँ मैंने बड़ों के टेंशन होने वाली बात का जिक्र नहीं किया इतनी बेवकूफ थोड़े न थी मैं | दोस्तों का रूठना, पेंसिल का टूटना, गेम में हारना, क्लास में मार खाना ये सब तो मम्मी की नजर में टेंशन था नहीं सो मैंने सिर्फ पढाई की टेंशन के बारे में
लिखा | बताऊँ वह कौन सी कविता थी
बस्ते के बोझ से दबा बचपन 
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उफ़ यह इतना भारी भरकम बस्ता 
बचों की हालत को किया इसने पस्ता
हालत पस्त हुआ इसे उठाते उठाते 
घर से स्कूल, स्कूल से घर लाते लाते 
इसे लेकर थके हुए से जब बच्चे स्कूल पहुचे 
आप ही बताएँ पढाई में भला उनका जी कैसे लगे ?
शाम को थके हरे बच्चे जब घर आते 
जल्दी से होमवर्क करने  में जुट जाते 
रात को सोते हैं इसी टेंशन में 
उठनाहै जल्दी हीं कल सुबह में 
अरे हाय! यह क्या हो गया 
बस्ते के बोझ में बचपन कहीं खो गया 
दूरस्थ शिक्षा लेने के कारण अब मेरे पास बस्ते का बोझ तो नहीं रहा ( ई- बुक्स से ही काम चल जाता है ) ना हीं होमवर्क का टेंशन पर बचपन तो खो ही गया न | वक्त को बढ़ने से कौन रोक सकता है ??? पर इसमें एक सकारात्मक बात भी है की मेरे बचपन का सपना जो अभी अधुरा है वह पूरा जरूर होगा | कौन सा सपना ? अरे वही बड़ा होने वाला सपना |
एक दिन हम बड़े बनेंगे एक दिन
मन में है विश्वास पूरा है विश्वास
 हम बड़े बनेंगे एक दिन

Friday, November 12, 2010

वह आखिरी तश्वीर

वह आखिरी तश्वीर 
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नहीं सुनी मैंने किसी और कि जबानी 
यह तो है मेरी आँखों देखी कहानी 
अपने अकेलेपन से ऊबी हुई सी 
अनजाने ख्यालों में डूबी हुई सी 
उस दिन मैं  तन्हा छत पर खड़ी थी 
आंखे बस राहों पर गडी थी 
पहली बार उस दिन मैंने' उसकी' झलक पायी थी 
पड़ोस में रहने 'वह' और उसकी बूढी माँ आई थी 
मुझे मालूम नहीं क्या नाम था उसका 
दुर्बल,साँवला पर आकर्षक चेहरा था उसका 
खिड़की से एक दिन देखा उसे चित्र बनाते हुए 
बदरंग कागज़ पर बेजान तुली से जीवन सजाते हुए 
हाँ एक उम्दा कलाकार था वह 
शांत, संजीदा चित्रकार था वह 
उन मनमोहक चित्रों को देखने के लालच से 
उसके घर गई यूँ एक दिन  हीं बहाने से  
गजब का आकर्षण था उसकी सभी चित्रों में 
सचमुच जान भर दिया था उन बेजान चीजों में 
अपनी कृतियाँ दिखाता और बस मुस्कुराता जाता था 
मैं तारीफ करती पर वह तो बस हँसता जाता था 
उन चित्रों में ऐसी खोई नाम पूछने की भी सुध ना रही 
पाँच घंटे पता नहीं कैसे बस उन चित्रों में खोई रही 
जाते जाते मैंने कहा धन्य हैं ये हाथ जो बेजान चित्रों में जान डाल देते हैं 
पहली बार उसने कहा नहीं धन्य है वो इश्वर जो इन हाथों में कला देते हैं 
शायद घर पर मुझे उस दिन डांट पड़ी थी 
पूरे पाँच घंटे उस अजनबी के घर जो रही थी 
पहली बार डांट सुन मैं रोई नहीं थी 
मैं तो अब तक चित्रों में खोई हुई थी 
अगले दिन किसी के रुदन से मेरी नींद खुली थी 
पता चला उसकी माँ चिल्ला-चिल्ला कर रो रही थी 
मैंने सबको कहते सुना था, ये तो होना ही था 
कैंसर रोगी था उसे तो दुनिया से जाना ही था 
इस वज्रपात से मैं स्तब्ध खड़ी थी 
दुखी थी, किन्तु मैं रो भी न सकी थी 
व्यथित उस बूढी माँ को देखा तो कुछ याद आया 
उसका वह "आखिरी चित्र" आँखों में उतर आया 
बिल्कुल यही हाँ बिल्कुल यही दृश्य था उसमे 
आज भी मेरी यादों में जिन्दा है वो और वह आखिरी तश्वीर 
वह मार्मिक, हृदयविदारक, पीड़ा दायी आखिरी तश्वीर 
                .................आलोकिता 

Thursday, November 11, 2010


नमस्कार दोस्तों
हार्दिक स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर | बहुत दिनों से सोचते सोचते आज मैंने ब्लॉग लिखना प्रारंभ किया है | ऐसा नहीं है कि क्या लिखुँ मैं समझ नहीं पाती दिक्कत यह है कि क्या क्या लिखुँ सोचकर उलझ जाती हूँ| आपने उस गाने को तो सुना हीं होगा
"मैं कहाँ जाऊं होता नहीं फैसला
एक तरफ उसका घर एक तरफ मयकदा "
शायर कि परेशानी यह है कि वह निर्णय नहीं कर पा रहा कि अपनी माशूका के घर जाए या फिर मयखाने ? ठीक वही हालत मेरी है कभी कोई बात अपनी तरफ मेरा ध्यान आकृष्ट करता है तो तो उसी छण किसी दूसरी बात का नशा मुझे अपनी तरफ खींचता है | चूँकि आज मैं पहली बार यंहा लिख रही हूँ तो सोचती हूँ अपने संछिप्त परिचय से ही शुरू करूँ | नाम तो आप जानते ही होंगे 'आलोकिता ' जिसका अर्थ है अँधेरे पथ को रौशन करने वाली |मेरी जिन्दगी सदा से एक खुली किताब रही है और दोस्तों कि इसमें  विशेष जगह रही है | कहते हैं वक्त के आगे बड़े बड़े नहीं टिक पाते| उसी वक्त कि आंधी ने एक तिनके की तरह उड़ा कर मुझे दोस्तों से दूर एक वीराने में फेंक दिया | आज जब अपने  अब तक के जीवन का सारांश लिखना चाहती हूँ तो मेरे जेहन में बस ये आठ पंक्तियाँ ही उभरतीं हैं |
"सपनों को हकीकत के खाक में मिलते देखा है |
चाहत को अपनी तड़प कर मरते देखा है |
अरमानों की चिता जली है हमारी |
ग़मों को खुशीकी झीनी चादर में लिपटे देखा है |
अश्क पीकर हमने मुस्कुराना सीखा है |
ग़मों के दलदल में हमने जीना सीखा है |
जीने क लिए हर पल मरते हैं हम |
खुशी की आहट से भी अब डरते हैं हम |"
उपरोक्त पंक्तिओं का एक- एक लफ्ज मेरे दिल से निकला है |सचमुच खुशी से डरती हूँ कि जाने ये छोटी सी खुशी अपने पीछे ग़मों का कितना बड़ा पहाड़ लेकर आ रहा है अपने पीछे मेरी खातिर |पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि खुशियों कि तलाश हीं बंद कर दूँ |अपने अनुभव के आधार पर ही आपसे एक बात कहना चाहूंगी जिन्दगी में कितने भी गम आये सदा हंसते-मुस्कुराते रहिये इससे आपका दुःख ख़त्म तो नहीं होगा पर हाँ दुःख को सहने कि क्षमता जरूर मिलती है | रोने से उदास होने से शक्तियां क्षीण पड़ जाती है |बस आज इतना ही कहना चाहूंगी आगे अब अगली बार अपनी कवितायें लिखूंगी |